वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
द्रष्टुमिच्छति शक्रस्त्वां देवराजो महाद्युते ||
३२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
द्रष्टुमिच्छामि तां चाहं पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
उत्तङ्क उवाच
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय़ ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
व्राह्मण उवाच
द्रष्टुमिच्छामि भवति तं देवं नागमुत्तमम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुमिच्छामि शैलाग्रं त्वद्वाहुवलमाश्रिता ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
द्रष्टुमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
द्रष्टॄणां प्रीतिजननं सर्वेषां भरतर्षभ ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
द्राव्यते तद्वदापन्ना पाण्डवैस्तव वाहिनी ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
द्राव्यमाणं रणे चैव कर्णेनामित्रकर्शिना ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
द्राव्यमाणं वलं दृष्ट्वा भीमसेनेन धीमता |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
द्राव्यमाणान्यदृश्यन्त सौवलेन महात्मना ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
द्राव्यमाणे वले तस्मिन्हार्दिक्येन महात्मना ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़न्निषुभिस्तूर्णं श्रुतकर्मा व्यरोचत ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़ामास योधान्वै शतशोऽथ सहस्रशः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़ामास विशिखैर्निशामध्ये विशां पते ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़ामासुरत्युग्रास्तत्र तत्र तदा तदा ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़ामासुराजौ ते त्रिदशा दानवानिव ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़ित्वा च तत्सैन्यं कम्पय़ित्वा महारथान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
द्रावय़ित्वा तु तत्सैन्यं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
द्रुतं च याति सविता तत एतद्व्रवीम्यहम् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
द्रुतं प्रय़ाताः शिविराणि राज; न्दिवाकरं रक्तमवेक्षमाणाः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
द्रुतं यय़ौ कर्णजिघांसय़ा तथा; यथा मरुत्वान्वलभेदने पुरा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
द्रुतं समनुय़ातश्च द्रोणेन रथिनां वरः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
द्रुतं सरस्वतीकूलात्स्मय़न्निव महावलः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
द्रुतं सेनामवैक्षन्त भिन्नकूलामिवापगाम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रुतमन्तः शरीरे ते सततं परिधावतः ||
१२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदं च विराटं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदं च विराटं च प्रैषीद्वैवस्वतक्षय़म् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
द्रुपदं च सहामात्यं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदं तु सहानीकं द्रोणप्रेप्सुं महारथम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदं त्रिभिरासाद्य शरैर्विव्याध दारुणैः ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदं न्याय़तो राजन्संय़ुक्तमुपतस्थिवान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदं पञ्चभिस्तीक्ष्णैर्दशभिश्च शिखण्डिनम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदं पाण्डुपुत्राणां संनिधौ केशवस्य च ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदं वृषसेनस्तु ससैन्यं सपदानुगम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदं सञ्जिघृक्षन्तः साय़ुधाः समुपाद्रवन् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदः काशिराजश्च शिखण्डी च महारथः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदः पञ्चविंशत्या विराटो दशभिः शरैः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
द्रुपदः श्वशुरो येषां येषां श्यालाश्च पार्षताः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
द्रुपदः सह पुत्रेण सिद्धार्थेन शिखण्डिना |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदद्रौपदेय़ानां द्रौपद्या सहितो ददौ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदश्च तथा राजा पाञ्चालैरभिरक्षितः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदश्च त्रिभिर्वाणैर्विव्याध निशितैस्तथा |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदश्च महातेजा वलेन महता वृतः |
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदश्च महाराज ततः पश्चादुपाद्रवत् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदश्च विराटश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदश्च विराटश्च पुत्रभ्रातृसमन्वितौ ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदश्चापि राजर्षिस्तत एवाभवद्गणात् |
७४ क