chevron_left  तत्रागमद्वासुदेवोarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रागमद्वासुदेवो वनमाली हलाय़ुधः |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
वृहस्पतिरु उवाच
तत्रागमय़ भद्रं ते भूय़ एव पुरन्दर ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राग्निकल्पा होतार आसन्सत्रे महात्मनः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राग्निकार्यं कृतवान्कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २८८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राग्निशरणे कॢप्तमासनं तस्य भानुमत् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
तत्राङ्गुष्ठेन राजेन्द्र निखर्वमपरं ततः |
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
तत्राङ्गो नाम राजर्षिः सुदेष्णाय़ामजाय़त |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तत्राच्छिद्यत वीरस्य सखड्गो वाहुरुद्यतः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राजगाम त्वरितो दिदृक्षुः पाण्डुनन्दनान् ||
१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिष्ठिरः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राजगाम वलवान्वलभद्रः प्रतापवान् ||
३२ घ
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राजगामाशु नरो द्वितीय़ो; निवेदय़िष्यन्निह सिद्धमन्नम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राजग्मुर्वकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
तत्राजल्पन्मिथः केचित्समाभाष्य परस्परम् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
तत्राजय़द्वासुदेवः शल्यं नय़नसाय़कैः |
७२ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्राजय़न्सदा देवान्दानवा घोररूपिणः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तत्रातिशय़िनी वुद्धिस्तत्सौक्ष्म्यमिति वर्तते ||
८१ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
तत्रातिष्ठत राजेन्द्र पूर्वमेव समाहितः |
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रातिष्ठन्महाराजो रूपमिन्द्रस्य धारय़न् |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रातीय़ुरथो वुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तत्रातुष्यन्त योधाश्च सिद्धाश्चापि दिवि स्थिताः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
तत्रात्मा मानसो व्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
तत्रात्मानं शोचते पापकर्मा; वह्वीः समाः प्रपतन्नप्रतिष्ठः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
तत्रादह्यन्त भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रादृश्यन्त गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तत्रादृश्यन्त रक्षांसि पिशाचाश्च पृथग्विधाः |
१२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतं परं चक्रे कृतवर्मा महारथः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतं परं चक्रे कौन्तेय़ः कृष्णसारथिः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतं परं चक्रे राधेय़ः शत्रुकर्शनः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतं परं चक्रे शल्यः शत्रुनिवर्हणः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतं महाराज दृष्टवानस्मि संय़ुगे |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुततमं द्रौणिर्दर्शय़ामास विक्रमम् |
११३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम आवन्त्यानां पराक्रमम् |
७० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम कुन्तीपुत्रस्य पौरुषम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम कुन्तीपुत्रे युधिष्ठिरे |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम कृत्स्नामक्षौहिणीं हताम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम चित्ररूपं विशां पते |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम तव तेषां च भारत |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् |
८९ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य विक्रमम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम द्रौणेराशु पराक्रमम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम धृष्टद्युम्नस्य पौरुषम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम पाञ्चालानां पराक्रमम् |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम पार्षतस्य पराक्रमम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य पौरुषम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य विक्रमम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम मद्रराजस्य पौरुषम् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम रणे पार्थस्य विक्रमम् |
१९ क