वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तव |
५ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
नलस्य दय़ितानश्वान्योजय़ित्वा महाजवान् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
नलस्य वा दमय़न्ती यथाभू; द्यथा शची वज्रधरस्य चैव ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
नलस्येव महानासीन्न च पश्यामि नैषधम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
नलिनी द्विरदेनेव समन्तात्फुल्लपङ्कजा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
नलिनी द्विरदेनेव समन्ताद्विप्रलोडिता ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
जनमेजय़ उवाच
नलिन्यां कदनं कृत्वा वराणां यक्षरक्षसाम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
नलिन्यां विसमध्यस्थो वभूवाव्दगणान्वहून् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
नलिन्याश्चालकाख्याय़ाश्चन्दनानां वनस्य च |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
नले चेहागते विप्र भूय़ो दास्यामि ते वसु |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमद्गृहान् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
नले यः सम्यगातिष्ठेत्स गच्छेद्वध्यतां मम ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
नलेन सङ्गृहीतेषु पुरेव नलवाजिषु |
५ क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
नलेन सहितां तत्र दमय़न्तीं पतिव्रताम् ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
नलो नाम महाभागस्तं मार्गाम्यपराजितम् ||
११९ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
नलो नामारिदमनः पुण्यश्लोक इति श्रुतः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदय़म् |
१०९ क
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
नलोऽपि राजा कौन्तेय़ श्रुत्वा राज्ञां समागमम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
नल्वमात्रपरीणाहो घनच्छाय़ो वनस्पतिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञेऽप्यात्मसम्भवाः |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
नव चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
नवं ततोऽन्यत्समरे प्रगृह्य; राजा धनुर्घोरतरं महात्मा |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
नवं तु विष्टरं कौश्यं कृष्णाजिनकुशोत्तरम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
नवजं शशिनं दृष्ट्वा वक्रं तन्तुमिवाम्वरे ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
नवजलदसवर्णैर्हस्तिभिस्तानुदीय़ु; र्गिरिशिखरनिकाशैर्भीमवेगैः कुणिन्दाः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
नवतन्तुर्वकनखः शय़ोनरतिरेव च ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
नवत्या कुण्डधारस्तु विशालाक्षश्च सप्तभिः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
नवत्या जगतीपालं छादय़ामास पत्रिभिः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
नवत्या नवभिश्चोग्रैः शतेन पुनरार्दय़त् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
नवत्या साय़कानां तु कम्पय़ामास भारत ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
नवत्या साय़कैः क्षिप्रं राजन्विव्याध वक्षसि ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
नवत्या साय़कैस्तीक्ष्णैर्दारय़ामास भारत ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
नवद्वारं पुरं गत्वा हंसो हि निय़तो वशी |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
नवद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावैः समन्वितम् |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
नवद्वारं पुरं विद्यात्त्रिगुणं पञ्चधातुकम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम् |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारय़न् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
नवनीतं यथा दध्नः काष्ठादग्निर्यथैव च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
नवनीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मतः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
नवनीतं यथा दध्नो द्विपदां व्राह्मणो यथा ||
२०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
नवनीतं यथा दध्नो मलय़ाच्चन्दनं यथा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
नवनीतं सरस्वत्या वुद्धिरेषा प्रभाविता ||
७६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
नवनीतपङ्काः क्षीरोदा दधिशैवलसङ्कुलाः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
नवभिः साय़कैर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
नवभिः साय़कैस्तीक्ष्णैस्त्रिंशता पुनरर्दय़त् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
नवभिर्नवभिश्चैव दोषैर्वाग्वुद्धिदूषणैः |
७८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
नवभिर्निशितैर्भल्लैर्निजघान युधिष्ठिरम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
नवभिर्निशितैर्वाणैराजघान स्तनान्तरे ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
नवभिर्वज्रसङ्काशैर्नमुचिं वृत्रहा यथा ||
१६ ख