वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि चाप्लुत्य महानुभावः; सन्तर्पय़ामास पितॄन्सुरांश्च |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि जतुगृहे दग्धुं समारव्धा न शकिता विदुरमन्त्रितेन ||
७८ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमानः स वीर्यवान् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि दत्त्वा दानानि द्विजातिभ्यः परन्तप |
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि दत्त्वा वसु रौहिणेय़ो; महावलः केशवपूर्वजोऽथ |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि द्रविडैरन्ध्रै रौद्रैर्माहिषकैरपि |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तत्रापि द्वारपालास्तमुग्रवाचो न्यषेधय़न् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
तत्रापि निधनं प्राप्तः कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञैः पञ्चकालानरिन्दम |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
तत्रापि प्रय़तो राजन्नहुषस्त्रिदिवे वसन् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तत्रापि मे देवराजेन विघ्नो; हितार्थिना फल्गुनस्यैव शल्य ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथाज्ञप्तमथाकरोत् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
तत्रापि लभते दुःखं तत्रापि लभते सुखम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा विप्रेभ्यो रत्नसञ्चय़ान् |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा व्राह्मणेभ्यो महाय़शाः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपाय़ोऽर्जुनस्य वै ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तत्रापि सुमहद्युद्धं घोररूपं विशां पते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तत्रापि सुमहाभागः सुखभागभिजाय़ते |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापो मे प्रवर्तन्ते यत्र यत्राभिकामय़े ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्यधिकसन्तापो विश्वामित्रो महामुनिः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
तत्राप्यनेकधा वेदान्भेत्स्यसे तपसान्वितः |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोय़ं हलाय़ुधः |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्याप्लुत्य मतिमान्व्रह्मय़ोनिं जगाम ह ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्यासादय़ामासुर्वकं नाम महावलम् |
१०० क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
तत्राप्युपस्पृश्य ततो महात्मा; दत्त्वा च वित्तं हलभृद्द्विजेभ्यः |
६५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य महानुभावो; वसूनि दत्त्वा च महाद्विजेभ्यः |
६१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य वलो दत्त्वा दानानि चात्मवान् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य वलो महात्मा; दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तत्राप्येष महाराज दृष्टो धर्मः सनातनः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्लुत्य ततो व्रह्मा सह देवैः प्रभुः पुरा |
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्लुत्य वलो राजन्दत्त्वा दाय़ांश्च पुष्कलान् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्लुत्य स धर्मात्मा उपस्पृश्य हलाय़ुधः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राभवत्तदा राजन्व्रह्म क्षत्रेण सङ्गतम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिगम्य चेशानं गोसहस्रफलं लभेत् |
७० क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसङ्करात् ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिगम्य राजेन्द्र पूजय़ित्वा वृषध्वजम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
तत्राभिगृद्धा राजानो विनिघ्नन्तीतरेतरम् ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तत्राभिद्रवतां पार्थमारावः सुमहानभूत् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
तत्राभिमन्युः सङ्क्रुद्धो द्रौपदेय़ाश्च मारिष |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राभिषिक्तः पृथुलोहिताक्षः; सहानुजैर्देवगणान्पितॄंश्च |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः |
१३२ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वाणस्तीर्थकोट्यां युधिष्ठिर |
१०५ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वाणो अग्निष्टोमफलं लभेत् ||
१२८ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्रफलं लभेत् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वाणो वाजपेय़मवाप्नुय़ात् ||
१२१ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहितः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वीत नागतीर्थे नराधिप |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः |
१२३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः |
४५ क