सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राहूतागताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
तत्राय़मपि भोक्ता वै देय़मस्मै च मे धनम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
तत्रेतिहासं वक्ष्यामि धर्मस्यास्योपवृंहणम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
तत्रेदं शृणु मे पार्थ चतुर्णां तेजसां मतम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
कर्ण उवाच
तत्रेदानीं समेष्यामः पुनः सार्धं त्वय़ानघ ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
तत्रेध्मानय़ने शक्रो निय़ुक्तः कश्यपेन ह |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
तत्रेन्द्रं विसग्रन्थिगतमदर्शय़त् ||
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रेमा वसतीः शिष्टा विहरन्तो रमेमहि ||
१३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तत्रेमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वमाद्रेय़जाङ्गलाः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोषितो नरः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रेश्वरमय़ाचन्त दक्षिणार्थं मनीषिणः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तत्रेषुभिः क्षिप्यमाणैः पतद्भिश्च समन्ततः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रेष्ट्वा तु गतः सिद्धिं सहस्राक्षो महाय़शाः ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रेष्ट्वा पुरुषव्याघ्रो यय़ातिः पृथिवीपतिः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
तत्रेह वै दृष्टफलं तु कर्म; पीत्वोदकं शाम्यति तृष्णय़ार्तः ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रेय़ं धृतराष्ट्रस्य कथा समभवन्नृप |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
तत्रेय़मर्थमात्रा मे भीमसेन विवक्षिता |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वाय़ुरुच्यते |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
तत्रैकगुणमाकाशं शव्द इत्येव च स्मृतः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
तत्रैकगुणमाकाशं शव्द इत्येव तत्स्मृतम् |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तत्रैकवाणनिहतानपश्याम महागजान् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
तत्रैकस्तूर्णमगमत्तत्पदे परिवर्तय़न् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैकस्य तु भार्या वै वसोर्वासवविक्रम |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रिय़क्रिय़ः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तत्रैकोऽस्त्रवलश्लाघी कर्णो मानी न विव्यथे |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तत्रैकोऽस्त्रवलश्लाघी द्रौणिर्मानी न विव्यथे |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तत्रैतान्पर्युपातिष्ठन्दुर्योधनपुरःसराः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनं चितास्थं माद्री समन्वारुरोह ||
७५ क
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
तत्रैनं च्यवनो राजन्याजय़ामास भार्गवः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनं नागराः सर्वे सत्कारेणाभ्ययुस्तदा |
२९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनं पर्युपातिष्ठन्व्राह्मणा राष्ट्रवासिनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
तत्रैनं रुषिता विप्रा विप्रकारप्रधर्षिताः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तत्रैनं लोकपालास्ते दर्शय़ामासुरर्जुनम् |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनं विधिवद्राजन्प्रत्यगृह्णात्कुरूद्वहम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तत्रैनं विवृतं शून्यं रजः पर्यवतिष्ठते ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनं समुपातिष्ठत्साक्षाद्वाणी च केवला ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
तत्रैनमभिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
तत्रैनमर्जुनश्चैव पार्षतश्च सहानुगः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनमुपतिष्ठन्ति व्राह्मणा धनहेतवः |
२२ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनमुपसङ्कल्प्य पितृमेधं प्रचक्रिरे ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैनां प्रेषय़िष्यामि सुराहारीं तवान्तिकम् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
तत्रैव कुरुते काय़े यः स जीवः सनातनः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
तत्रैव कुरुते वुद्धिं ततः पापं चिकीर्षति |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैव गच्छ कौन्तेय़ यत्र सा सात्वतात्मजा |
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तत्रैव च निरुध्यन्ते प्रलय़े भूतभावने ||
२४ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
तत्रैव च मनुष्यस्य जीविताशा प्रतिष्ठिता |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्रैव च महाराज यक्षी लोकपरिश्रुता |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम् |
१४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैव च वसन्धीमान्धनुर्वेदपरोऽभवत् ||
१५ ख