आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ठेऽश्विनाविव |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रोपसदनं चक्रे द्रोणस्येष्वस्त्रकर्मणि |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा निय़तो निय़ताशनः |
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् ||
१०८ ग
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रोर्मिकलिलावर्तश्चुक्षुभे च महार्णवः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीः पञ्च विन्द्याद्वहु सुवर्णकम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीः पञ्च षष्ठकालक्षमी नरः |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुय़ात् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ||
७५ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ||
११४ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीमेकां सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीय़ते ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
तत्रोष्य सुचिरं कालं भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरेश्वरः |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्स राजा महाराज पाण्डवानां धुरन्धरः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तत्संवर्तमरुत्तीय़ं यत्राख्यानमनुत्तमम् ||
२०६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तत्संविधीय़तां क्षिप्रं मा नो ह्यर्थोऽतिगात्परान् ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
तत्संय़ोगेन वृद्धिं चाप्यपश्यत्स तु शङ्करः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सङ्गृह्य यय़ौ राजा ये चापि परिचारकाः ||
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सदः पार्थिवैः कीर्णं व्राह्मणैश्च महात्मभिः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
तत्सदः स परिषत्सभासदः; प्राप्य यो न कुरुते सभाभय़म् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तत्सदो वृषभाङ्कस्य दिव्यवादित्रनादितम् ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तत्सदो वृषभाङ्कस्य भीमरूपधरं वभौ ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्समन्त्रं ससंहारं सप्राय़श्चित्तमङ्गलम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
तत्समर्थं शुभं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
तत्समाप्त्यर्थमिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
तत्समाप्य यथोद्दिष्टं पूर्वकर्म समाहितः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
तत्समाश्च महेष्वासा द्रोणद्रौणिकृपा अपि ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
तत्समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
तत्समो वा भवास्माभिर्भक्ष्यान्दास्यामहे वय़म् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
तत्सम्पूज्य वचोऽक्रूरं सर्वसैन्यानि भारत |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तत्सम्प्रदीप्तं वलमस्मदीय़ं; निशाम्य पार्थास्त्वरितास्तथैव |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सम्प्राप्य गृहस्था ये पशुधान्यसमन्विताः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्याः; सर्वे देवा भुवनस्यास्य गोपाः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सरोऽथावतीर्याशु प्रभूतकमलोत्पलम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
तत्सर्वं कथितं चैव विकारं चैव तस्य तम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
तत्सर्वं काञ्चनीभूतं समन्तात्प्रत्यदृश्यत ||
७० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
तत्सर्वं कीर्तय़िष्यामि यथावत्तन्निवोध मे ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमतो भवेत् ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सर्वं त्वां समुद्दिश्य सहसा समुपागतः ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तत्सर्वं दर्शय़स्वाद्य पौरुषं महदास्थितः |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
तत्सर्वं देहिनां वीजं सर्वमात्मवतः समम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
तत्सर्वं न समं तात सन्तत्येति सतां मतम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्सर्वं नश्यते तस्य स्नातमात्रस्य भारत |
१२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्सर्वं पुरुषव्याघ्र नष्टं मे नष्टचेतसः ||
६ ख