भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तं यथावत्प्रतिव्यूह परानीकविनाशनम् |
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
९
देवदूत उवाच
तं यदीच्छसि कर्तुं त्वं प्राप्स्यसीमां प्रमद्वराम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तं यमः पापकर्माणं निर्यातय़ति दुष्कृतम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तं यमौ पृष्ठतोऽन्वैतां रक्षन्तौ पुरुषर्षभौ |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तं यात सर्वे सहिता निहन्तुं; मा वो रिपुः प्रार्थय़तामनीकम् ||
३९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
तं यान्तं पृष्ठगोप्तारमर्जुनस्य विशां पते |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशै; राय़ोधने नरवीरं चरन्तम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशैः; शरान्धमन्तं धनुषा दृढेन |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
तं यान्तमश्वैः शशिशङ्खवर्णै; र्विगाह्य सैन्यं पुरुषप्रवीरम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तं युध्यमानं राजानं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
तं रक्षत सुसंय़त्ता निघ्नन्तं शात्रवान्रणे ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तं रणे रभसं दृष्ट्वा सहदेवं महावलम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तं रथं मेघसङ्काशं वैय़ाघ्रपरिवारणम् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तं रथं यादवश्रेष्ठः समारुह्य परन्तपः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तं रथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णोऽभ्यर्च्य यथाविधि |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तं रथस्थं महावीरं यान्तं चामिततेजसम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तं रथेन नरव्याघ्रः प्रत्यगृह्णादभीतवत् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
तं रथेन नरश्रेष्ठं सम्पादय़ महारथम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तं रथै रथिनां श्रेष्ठाः परिवार्य समन्ततः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
तं राक्षसं भीमवलं भीमसेनेन पातितम् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
तं राक्षसमहामात्रमापतन्तं सपत्नजित् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तं राक्षसाश्च परिसंवहन्ते; राय़स्पोषः स विजिगीषुरेकः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तं राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वरम् ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
तं राजसूय़ं सुहृदः कार्यमाहुः समेत्य मे |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
तं राजा कस्त्वमित्याह ततस्तं प्राह मारुतः |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
तं राजा क्षीणभूय़िष्ठमाकृतीमात्रसूचितम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
तं राजा प्रत्युवाचेदं यन्मा किञ्चिद्भवान्वदेत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
तं राजा प्राहसद्दृष्ट्वा मुच्यतामिति चाव्रवीत् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
तं राजा सह तैश्चोरैरन्वशाद्वध्यतामिति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
तं राजा साधु यः शास्ति स राजा पृथिवीपतिः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तं राजानं तथा क्लान्तं दृष्ट्वा राजञ्जनार्दनः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
तं रासभाः प्रत्यभाषन्त राज; न्समन्ततः पक्षिणश्चैव रौद्राः ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
तं रुद्रं रौद्रकर्माणं रौद्रैः कर्मभिरच्युतम् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तं रुवन्तं ततो वत्सं जामदग्न्यः स्वमाश्रमम् |
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तं लक्ष्मणोऽप्यभ्यधावत्प्रगृह्य सशरं धनुः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं; रविवर्णमीश्वरगतिं वहुशः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
तं लोभमसिभिस्तीक्ष्णैर्निकृन्तन्तं निकृन्तत ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तं वज्रनिष्पेषसममास्फोटितरवं भृशम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
तं वञ्चय़ित्वाधमवुद्धिशील; मज्ञातवासं सुखमाप्नुय़ामः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
तं वने विजने गर्भं सिंहव्याघ्रसमाकुले |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तं वपाधूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तं वरं सान्तरं तस्मै ददौ सञ्चिन्त्य वुद्धिमान् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
तं वलिं नाधिगच्छामि व्रह्मन्नाचक्ष्व मे वलिम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
तं वलिं नाधिगच्छामि व्रह्मन्नाचक्ष्व मे वलिम् ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
तं वलिं नाधिगच्छामि व्रह्मन्नाचक्ष्व मे वलिम् ||
६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तं वलौघमपर्यन्तं देवैरपि दुरुत्सहम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तं वलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षय़म् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
तं वव्रुः पाण्डवा धौम्यं पौरोहित्याय़ भारत ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
तं वव्रे वाहनं कृष्णो गरुत्मन्तं महावलम् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तं वशे न्याय़तः कृत्वा सुखं वत्स्यामहे वय़म् |
१३ क