द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा घोररूपं तु द्रौणेरस्त्रं भय़ावहम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा चरितं तस्य सिंहविक्रान्तगामिनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा चरितं तस्य सौभद्रस्यामितौजसः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा तादृशं युद्धं द्रोणपाण्डवय़ोस्तदा |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा तावकं सैन्यं विद्रुतं शिविरं प्रति |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शन्तनुः |
९४ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म रावणं भय़माविशत् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा परमप्रीतो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं दाशार्हा जातमन्यवः |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नरा नार्यश्च सङ्गताः |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पुत्राणां दर्शनं पुनः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं प्रत्यक्षं स्वर्गलिप्सय़ा |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं माधवस्य सभातले |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता मुनिसत्तमाः |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यमद्भुतं रोमहर्षणम् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य घोरं कर्म भय़ावहम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा लव्धकामः स मनसा पाण्डुनन्दनः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा विद्रुतं सैन्यं विश्वामित्रस्तु गाधिजः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वा विस्मय़ं जग्मुर्गान्धाराः सर्व एव ते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
तद्दृष्ट्वा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमय़ाचत |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तद्दृष्ट्वा व्रीडितो राजन्स मुनिः पादय़ोर्गतः ||
१०७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
ऋषिरु उवाच
तद्दृष्ट्वा व्रीडितो राजन्स मुनिः पादय़ोर्गतः ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा समरे कर्म कर्णशैनेय़योर्नृप ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा समरे कर्म तव पुत्रा विशां पते |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा सोपधं कर्म कौशिकेन कृतं निशि |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्दृष्ट्वोपस्थितं युद्धं समासन्नं महात्ययम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तद्देवगन्धर्वसमाकुलं च; यक्षासुरेन्द्राप्सरसां गणैश्च |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तद्देवनागासुरसिद्धसङ्घै; र्गन्धर्वय़क्षाप्सरसां च सङ्घैः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्देवय़क्षगन्धर्वमहोरगसमाकुलम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
तद्देहं देहिनां युक्तं मोक्षभूतेषु वर्तते ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
तद्धत्वा सर्वभूतानामभावकृतनिश्चय़म् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
जमदग्निरु उवाच
तद्धनं व्राह्मणस्येह लुभ्यमानस्य विस्रवेत् ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्धनौघमपर्यन्तं पार्थः पार्थिवमण्डले |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तद्धर्मराजवचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः |
३० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्धर्मराजस्य वचो निशम्य; धर्मस्वरूपी भगवानुवाच |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तद्धर्मशीलस्य वचो निशम्य; राज्ञः क्रुद्धस्याधिरथौ महात्मा |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
तद्धर्मे यतमानानां महान्धर्मो नशिष्यति |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
तद्धातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदय़म् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्धारय़ेथाः प्रय़तः शृणु चेदं वचो मम ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्धि घोरमसङ्ख्येय़ं गर्जच्च विविधा गिरः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
तद्धि श्रोत्राश्रय़ं भूतं शव्दः श्रोत्रं समाश्रितः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
तद्धितं च प्रिय़ं चैव धृतराष्ट्रस्य धीमतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्धिरण्यमपर्यन्तमावृत्तं कुरुजाङ्गले |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
तद्धिय़ा ध्याय़ति व्रह्म जपन्वै संहितां हिताम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
तद्भक्तास्तद्गृहा राजंस्तद्धनास्तदपाश्रय़ाः |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
४
तमृषय़ ऊचुः
तद्भगवांस्तु तावच्छौनकोऽग्निशरणमध्यास्ते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्भद्रसुख भद्रं ते मानसं विनिवर्त्यताम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
तद्भवानृषिसङ्घस्य हितार्थं सर्वचोदितः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
तद्भवानेवमभ्यस्य वर्ततां श्रूय़तां तथा |
४ क