chevron_left  तस्मिन्वृक्षेarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
तस्मिन्वृक्षे तथाभूते कोटरेषु चिरोषितः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
तस्मिन्वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय़ पार्थिव |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वृत्ते महानासीत्सङ्ग्रामस्तारकामय़ः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वेश्मनि सर्वाणि निक्षिपेथाः समन्ततः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
तस्मिन्वै वर्तसे विप्र किमन्यत्परिपृच्छसि ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
तस्मिन्व्यूढे च दग्धे च चित्ते मरणधर्मिणि |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
तस्मिन्व्रजति दुर्धर्षे प्रास्खलद्रुक्मिणी पथि |
३० क
विराट पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्व्रुवति तद्वाक्यं धार्तराष्ट्रे परन्तपे |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्संवत्सरे राजन्धृतराष्ट्रान्महाय़शाः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सङ्क्रन्दे तुमुले वर्तमाने; सैन्ये भग्ने लीय़माने कुरूणाम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
तस्मिन्सञ्चूर्णिते देशे भद्रामादाय़ वारिपः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्सत्रे तदा व्रह्मा स्वय़ं भागमकल्पय़त् |
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्सत्रे तु यत्किञ्चिदय़ोग्यं तत्र नाभवत् |
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजोत्तमाः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सन्त्यजति प्राणान्मृत्युसाधारणीकृते |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सन्ने महाराज कृपे शारद्वते युधि |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्समभवद्द्रोणः कलशे तस्य धीमतः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा चारुहासिनी |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्समिद्धे पतिताः शलभा इव ते सुताः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्समुत्थिते शव्दे तुमुले लोमहर्षणे |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्समुदिते रङ्गे कथञ्चित्पर्यवस्थिते |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्समुदिते शव्दे तुमुले लोमहर्षणे |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्सम्प्रस्थिते कृष्णा पृथां प्राप्य यशस्विनीम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
अर्जुन उवाच
तस्मिन्समय़संय़ोगे व्रूहि किञ्चिदनुग्रहम् |
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
तस्मिन्सरसि कृत्वाहं विधिवत्तर्पणं पुरा |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तस्मिन्सरसि राजेन्द्र व्रह्मणो यूप उच्छ्रितः |
७५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्सरस्वतीतीर्थे विश्वामित्रो महामुनिः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्सर्वाणि कर्माणि क्रिय़न्ते कर्मकर्तृभिः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सात्यकिना वीरे द्वैरथे विरथीकृते |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सुघोरे नृपसम्प्रहारे; हताः प्रवीराः सरथाः ससूताः |
११७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सुतुमुले घोरे काले परमदारुणे |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भय़ावहे |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सुतुमुले शव्दे भीरूणां भय़वर्धने |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
तस्मिन्सुप्ते प्रलीय़ेते समानो व्यान एव च |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्सैन्ये महावर्ते पातालावर्तसंनिभे |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
तस्मिन्स्थिते तदा राजन्क्रुद्धे विधृतकार्मुके |
११६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
तस्मिन्स्थितो नित्यमग्निः स्थाल्यामिव समाहितः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
तस्मिन्हते कुरवो निर्जिताः स्यु; रेवम्वुद्धिः पार्थिवो धर्मपुत्रः |
६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते गजानीके पुत्रो दुर्योधनस्तव |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
तस्मिन्हते तु भगवन्केतौ सर्वधनुष्मताम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तस्मिन्हते तोय़दतुल्यरूपे; कृष्णां पुरस्कृत्य नरेन्द्रपुत्राः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय ९९
लोमश उवाच
तस्मिन्हते दैत्यवरे भय़ार्तः; शक्रः पदुद्राव सरः प्रवेष्टुम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्हते भ्रातरि सूतपुत्रो; वैकर्तनो वीर्यमथाददानः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते महामात्रे पाञ्चालानां रथर्षभे |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते महाराज त्रस्तास्तस्य पदानुगाः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते महासत्त्वे भरतानाममध्यमे |
१०२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्हते महासत्त्वे महेष्वासे महावले |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्हते महेष्वासे कर्णे युधि किरीटिना |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कर्ण उवाच
तस्मिन्हते महेष्वासे भ्रातरस्तस्य मानद |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते महेष्वासे राजपुत्रे महारथे |
३२ क