chevron_left  तथाarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
तथा तु तत्तत्स्फुरदात्तकार्मुकं; त्रिभिः शरैर्यन्तृशिरः क्षुरेण |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु तिष्ठतां तेषां नारदो भगवानृषिः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु ते परिक्रम्य याज्यान्सर्वान्पशून्प्रति |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी; नप्ता शिनेरिन्द्रसमानवीर्यः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी; नप्ता शिनेश्चक्रधरप्रभावः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु तेषां वसतां तत्र राजन्महात्मनाम् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु तेषां सर्वेषां कथाभिर्नृपसंनिधौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान्वहतो वातरंहसः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
तथा तु दृष्ट्वा योधास्ते प्रहृष्टौ कृष्णपाण्डवौ |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तथा तु दृष्ट्वा राजानं वाष्पशोकसमन्वितम् |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु दृष्ट्वा वहु तत्तदेवं; रोरूय़माणां कुररीमिवार्ताम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु दृष्ट्वा संरव्धं शक्रं देवैः सहाच्युतौ |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तथा तु नर्दमानं तं भीमसेनं महारथम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
धृतराष्ट्र उवाच
तथा तु नर्दमानं तं भीमसेनं महावलम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तथा तु नर्दमाने वै भीमसेने रणोत्कटे |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु निघ्नतस्तस्य सर्वसत्त्वानि भारत |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
तथा तु निय़तात्मानं स तं नृपतिसत्तमम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
तथा तु पतिते राजन्मय़ि रामो मुदा युतः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
तथा तु परिकृष्यन्तं दृष्ट्वा सात्वतमाहवे |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु पृच्छन्तमतीव पार्था; न्वैचित्रवीर्यं तमचिन्तय़ित्वा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
धृतराष्ट्र उवाच
तथा तु मे कथय़से यथा युद्धं तु वर्तते |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
तथा तु यतमानस्य द्रोणस्य युधि भारत |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु यान्तं पुरुषप्रवीरं; भीष्मः शरैरभ्यहनत्तरस्वी |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु रक्षिणां तेषां व्रुवतां स तपोधनः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
तथा तु रममाणस्य दिवोदासस्य भूपतेः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
तथा तु वसतस्तस्य दस्युग्रामे सुखं तदा |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
तथा तु वहुकल्याणमुक्तवन्तं नराधिपम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तथा तु वितते व्योम्नि निस्वनं शुश्रुवुर्जनाः |
५५ क
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु विमुखे पार्थे द्रोणपुत्रस्य साय़कान् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तथा तु विरथे कर्णे पुत्रान्वै तव पार्थिव |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
तथा तु वैकर्तनपीडितं तं; भीमं प्रय़ान्तं पुरुषप्रवीरम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु स वराँल्लव्ध्वा धर्माद्धर्मभृतां वरः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
तथा तु समरे विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
तथा तु समय़ं कृत्वा दशमेऽहनि पाण्डवाः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ते कुण्डले वद्ध्वा तथा कृष्णाजिनेऽनय़त् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ते पाण्डवा रक्ष्याः पाह्यस्मान्महतो भय़ात् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
तथा ते राक्षसाः सर्वे भीमसेनमुपाद्रवन् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
तथा ते समरेऽन्योन्यं निघ्नन्तः क्षत्रिय़र्षभाः |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तथा तेजोमरीचिभ्यः शङ्खचक्रगदाधराः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तथा तेषां मज्जतां भारतानां; न स्म द्वीपस्तत्र कश्चिद्वभूव ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तेषां वसतां काम्यके वै; विहीनानामर्जुनेनोत्सुकानाम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तेषु च सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तथा तेषु निवृत्तेषु प्रत्युद्यातेषु भागशः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तथा तेषु विषक्तेषु सैन्येषु जय़गृद्धिषु |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तेषूपविष्टेषु समाजग्मुर्महर्षय़ः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
तथा तैरुपय़ातैश्च प्रतिय़ातैश्च भारत |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
तथा तौ कथय़न्तौ च चिन्तय़न्तौ च यत्क्षमम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तौ कथय़ित्वा तु वाष्पमुत्सृज्य दुःखितौ |
६ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तौ दुःखितौ दृष्ट्वा दुःशासनसुय़ोधनौ |
३३ क