द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
तथा तौ भृशसङ्क्रुद्धौ राक्षसेन्द्रौ महावलौ |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
तथा त्रिपथगा गङ्गा नदीनामग्रजा स्मृता |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तथा त्रीणि सहस्राणि त्रेताय़ां मनुजाधिप |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
तथा त्वं कुरुशार्दूल स्वेन धर्मेण शोभसे ||
१०८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वं भषसे कर्ण नरव्याघ्रं धनञ्जय़म् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
तथा त्वं सर्वराजभ्यो भ्राजसे रश्मिवानिव ||
१०९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा त्वत्तः प्रसूतोऽय़ं त्वमेकः सन्द्विधा कृतः ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
तथा त्वदर्चिर्निर्दग्धं सर्वं शुचि भविष्यति ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीय़तरा मम ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
राजो उवाच
तथा त्वमपि कल्याणि गदतो मे वचः शृणु ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
तथा त्वमपि कल्याणि व्राह्मणात्तपसाधिकात् |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
तथा त्वमपि कल्याणि सर्वैः समुदिता गुणैः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
तथा त्वमपि कौन्तेय़ व्राह्मणान्सततं प्रभो |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
तथा त्वमपि कौन्तेय़ शममास्थाय़ पुष्कलम् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
भीष्म उवाच
तथा त्वमपि कौन्तेय़ सम्यगेतत्समाचर ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
तथा त्वमपि गान्धारे यावत्पाण्डुसुतान्रणे |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि गान्धारे विपरीतानि पश्यसि ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा त्वमपि धर्मात्मन्कर्मणा च विशोधितः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि पाण्डूनां सेनानीः पुरुषर्षभ ||
३३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि पार्थश्च प्रख्यातावात्मकर्मभिः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा त्वमपि मय़्येव मनसा भरतर्षभ |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तथा त्वमपि राजेन्द्र लव्धासि विपुलां श्रिय़म् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद्वक्ष्यसेऽचिरात् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि राधेय़ सिंहमात्मानमिच्छसि |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि राधेय़ं सर्वतः परिपालय़ ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
तथा त्वमपि वर्तस्व सत्यधर्मपराय़णः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि वार्ष्णेय़ कृष्णतुल्यपराक्रमः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा त्वमपि शर्वाद्धि सर्वान्कामानवाप्स्यसि ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तथा त्वमपि सर्वासां सरितां वै पतिर्भव ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वमपि सर्वेषां कौरवाणां गतिर्भव ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
व्यास उवाच
तथा त्वमप्यच्युत मुञ्च शोक; मुत्तिष्ठ शक्रोपम हर्षमेहि |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तथा त्वां निहतामित्रं वय़ं नन्दाम भारत ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
तथा त्वय़ा कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
तथा त्वय़ा प्रहर्तव्यं मय़ि तत्त्वं च मे शृणु ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
तथा त्वय़ा प्रय़त्तव्यं मम चेत्प्रिय़मिच्छसि ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा तय़ोः संनिपातः शरय़ोरभवत्तदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
तथा तय़ोर्विवदतोर्विज्ञानविदुषोर्द्वय़ोः |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
तथा दत्तं नर्तने गाय़ने च; यां चानृचे दक्षिणामावृणोति ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
तथा दत्तकृतौ पुत्रावध्यूढश्च तथापरः ||
४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा ददर्श पाञ्चालीं कमलोत्पलमालिनीम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
तथा दन्तिसहस्रं च हय़ानामय़ुतं पुनः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तथा दन्तिसहस्रेण मत्तानां वीर्यशालिनाम् |
७३ क
विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा दश दिशः सर्वाः पतद्गाण्डीवमावृणोत् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां; पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा दहति राजन्यो व्राह्मणेन समं रिपून् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तथा दिवाकरेणोक्तः स्वप्नान्ते मम चाग्रतः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तय़ः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा दिव्यानि चास्त्राणि निखिलान्याहरिष्यति |
३५ क