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भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तथा पाण्डुसुताः पार्थं चिह्नमात्रेण जज्ञिरे ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
तथा पाण्डुसुतानां वै भीष्मो मर्माण्यकृन्तत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
तथा पात्रविशेषाश्च दानानां च परो विधिः |
२०३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
तथा पापस्तु तत्सर्वं न करिष्यति कौरवः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
तथा पार्थभुजोत्सृष्टाः शरास्तप्स्यन्ति मे सुतान् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तथा पार्थस्य सैन्यानि विच्छिन्नानि क्वचित्क्वचित् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
तथा पिण्याकसंमिश्रमशनं चोरय़ेन्नरः |
९४ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
तथा पितृगणाः सर्वे सर्वाणि च हवींष्यथ ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
तथा पितृन्वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
तथा पुण्यजनाश्चैव सिद्धा देवर्षय़ोऽपि च ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः |
९९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तथा पुत्रसहस्राणामय़ुतं च ददौ प्रभुः |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा पुत्राधिभिर्गाढमार्ता ह्यानर्तसत्कृता ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
तथा पुत्रैश्च मे तात ज्ञातिभिश्च सवान्धवैः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तथा पुरुषमानी स प्रत्यपाय़ाद्रथान्तरम् ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
तथा पूर्वगतानन्यान्स्वर्गं पार्थिवसत्तमान् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
तथा पृषध्रो नामासीद्राजा वज्रधरोपमः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा पौरजनः सर्वः शोचन्नास्ते जनाधिपम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
तथा पौलस्त्यतनय़ो रावणो नाम राक्षसः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ७८
वृहदश्व उवाच
तथा प्रकाशतां यातो जम्वूद्वीपेऽथ राजसु |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रकुरुत क्षिप्रमिति सैन्यान्यचोदय़त् |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
तथा प्रजापतिर्व्रह्मा अव्यक्तः प्रभवाप्ययः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
तथा प्रज्ञानतृप्तस्य नित्यं तृप्तिः सुखोदय़ा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा प्रतिभय़े तस्मिन्देवदानवसङ्कुले |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तथा प्रतिषिद्धो भैक्षं नाश्नाति न चान्यच्चरति |
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
तथा प्रतिसमादिष्टः कलिङ्गो वाहिनीपतिः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
द्रौपद्यु उवाच
तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत्करिष्यामि कौरवाः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
तथा प्रभाते कर्तास्मि यथा कृष्ण सुय़ोधनः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
धृतराष्ट्र उवाच
तथा प्रमथमानं तं महेष्वासमजिह्मगैः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
तथा प्रमाणं हि मय़ा कृतो व्रह्मा प्रसादजः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
तथा प्रलीनस्तमसि मूढय़ोनिषु जाय़ते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
तथा प्रविश्यान्तरमस्य सङ्ख्ये; को नाम जीवन्पुनराव्रजेत ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रविष्टं तत्तेजो न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
तथा प्रविष्टं तरुणं सौभद्रमपराजितम् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रवृत्ते सङ्ग्रामे घोररूपे भय़ानके |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रवृत्ते सङ्ग्रामे धनुरुद्यम्य दंशितः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रवृत्ते सङ्ग्रामे निवृत्ते च सुशर्मणि |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रवृत्तेऽस्त्रभृतां पराभवे; धनञ्जय़श्चाधिरथिश्च साय़कैः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
तथा प्रशंसते दीपान्यमः पितृहितेप्सय़ा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
तथा प्रशस्य ह्यभिपूज्य चैव ते; वरस्त्रिय़ं तामृषय़ः समागताः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
तथा प्रसादो भवति गङ्गां वीक्ष्य यथा नृणाम् ||
७५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रहृष्टे सैन्ये तु प्लवमानं महारथम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तथा प्राच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्योत्तरापथाः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा प्रेष्येषु सर्वेषु मित्रसम्वन्धिमातृषु |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तथा प्रय़तमानेषु पाण्डवेय़ेषु निर्भय़ः |
२१ क