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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
तथा धर्मविरोधेन प्रिय़मिथ्याभिध्याय़िना |
८९ क
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा धर्मात्मजस्तेषां चक्रे पूजामनुत्तमाम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
तथा धर्मादपेतेन कर्मणा गर्हितेन ये |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
तथा धर्मे परिचय़ः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
तथा धर्मो धारय़न्धर्मरूपं; विद्वांसस्तं सम्प्रपश्यन्ति वुद्ध्या ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
तथा धर्म्याणि सर्वाणि राजा राष्ट्रे प्रवर्तय़ेत् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा धातुर्विधातुश्च कुवेरस्य यमस्य च ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यैः सम्परितोषितः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
तथा ध्वजं सारथिं च त्रिभिस्त्रिभिरपातय़त् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तथा ध्वजो विहितो भौवनेन; न चेद्भारो भविता नोत रोधः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तथा ध्वजो विहितो भौवनेन; वह्वाकारं दृश्यते रूपमस्य ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तथा नद्यस्त्वप्रकाशाः शतशोऽथ सहस्रशः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
तथा ननाद वसुधा खुरनेमिप्रपीडिता |
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
तथा नराणां भुवि भावितात्मनां; यथाश्रय़ं सत्त्वगुणः प्रवर्तते ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा नरानभिक्रुद्धं निघ्नन्तं क्षत्रिय़र्षभान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
कृशतनुरु उवाच
तथा नरेन्द्र धनिनामाशा कृशतरी मय़ा ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तथा नश्यन्तु कौन्तेय़ाः सपाञ्चालाः ससृञ्जय़ाः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
तथा नष्टं तमो घोरं दीपैर्दीप्तैरलङ्कृतम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्चक्रचरास्तथा ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
तथा नान्यधृतं धार्यं न चापदशमेव च ||
७८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २५
कर्ण उवाच
तथा नित्यं हिते युक्तो मद्रराज भजस्व नः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
तथा निपतिते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तथा निपातिते कर्णे तव सैन्ये च विद्रुते |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभृतामपि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
तथा निर्हृतदोषस्य प्रेत्यधर्मः सुखावहः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा निवसतां तेषां पञ्चमं वर्षमभ्यगात् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
तथा निवातकवचाः कालखञ्जाश्च दानवाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
तथा निषिच्यते जन्तुः पूर्वकर्मवशानुगः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
तथा निष्किञ्चनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तथा नीलेन निर्भिन्नः सुमुखेन पतत्रिणा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५८
युधिष्ठिर उवाच
तथा नृशंसकर्माणं वर्जय़न्ति नरा नरम् ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
तथा नृशंसरूपेण यथान्यः प्राकृतो जनः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ||
१२३ ग
आदि पर्व
अध्याय १३४
युधिष्ठिर उवाच
तथा नो विदिता मार्गा भविष्यन्ति पलाय़ताम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
तथा नोद्धृतसाराणि प्रेक्षतां नाप्रदाय़ च ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
तथा पतत्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तथा पत्तिरथौघाश्च हय़ाश्च वहवो रणे |
७४ क
वन पर्व
अध्याय २८६
कर्ण उवाच
तथा परमतिग्मांशो नान्यं देवं कथञ्चन ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तथा पराङ्मुखरथं सैन्यं यौधिष्ठिरं नृप |
१३३ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
तथा परिवदन्नन्यांस्तुष्टो भवति दुर्जनः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
तथा परिवृतं दृष्ट्वा द्रोणमाचार्यसत्तमम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
तथा परिवृतं दृष्ट्वा वार्ष्णेय़ानां महारथम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
तथा परुषितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मातुलम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तथा परैर्वहुकरणैर्वराय़ुधै; र्हता गताः प्रतिभय़दर्शनाः क्षितिम् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
तथा पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
तथा पर्याकुले तस्मिन्निवेशे पाण्डुनन्दनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
तथा पवनसंय़ुक्तः पादैः पिवति पादपः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
तथा पश्यामहे स्पर्शमुभय़ोः पापपुण्ययोः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तथा पाण्डवसैन्यानि वभञ्ज युधि ते पिता ||
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् |
१६ क