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वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
तानि ते कीर्तय़िष्यामि पुण्यान्याय़तनानि च ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
तानि ते कीर्तय़िष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते; तत्त्वेन मे व्रूहि महर्षिकन्ये ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच
तानि त्विच्छामि ते द्रष्टुं दिव्यान्यस्त्राणि भारत |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
तानि दिव्यानि मेऽस्त्राणि प्रय़च्छ विवुधाधिप |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
तानि दुःखान्यनेकानि विप्रकारांश्च सर्वशः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि स्म साय़कैः |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तानि नागसहस्राणि भूमिपालशतानि च |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
तानि निर्मथ्य मनसा दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
तानि पुत्रान्पशून्घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशासताम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
तानि पुत्राय़ वा दद्युः शिष्याय़ानुगताय़ वा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
तानि पूर्वाणि वाक्यानि यच्चान्यत्परिदेवितम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
तानि प्रविष्टानि वृकोदराङ्गं; दहन्ति मर्माग्निरिवेन्धनानि ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तानि प्रीतान्येव तृष्णाक्षय़ान्ते; तान्यव्यथो दुःखहीनः प्रणुद्यात् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
तानि मे शृणु काम्यानि नक्षत्रेषु पृथक्पृथक् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
तानि मे शृणु काम्यानि फलं चैषां युधिष्ठिर ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
तानि मे शृणु दिव्यानि दैवान्यौत्पातिकानि च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
तानि यः संविजानाति ज्ञाननिश्चय़निश्चितः |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तानि यानानि देशेषु प्रतीक्ष्यन्ते स्म भारत |
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
तानि युद्धानि वक्ष्यामि कौन्तेय़स्य तवानघ ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तानि राजसहस्राणि समुत्तस्थुः समन्ततः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
तानि लङ्कां समासाद्य जघ्नुस्तान्रजनीचरान् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तानि वक्त्राणि विवभुर्व्योम्नि तारागणा इव ||
२७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
तानि वक्ष्यामि ते वीर विचित्राणि महान्ति च ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
तानि वद्धान्यनिष्टानि लम्वमानानि भारत |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
तानि विक्रीय़ यजते व्राह्मणो ह्यभय़ङ्करः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
तानि वेत्ति स योगात्मा ततः क्षेत्रज्ञ उच्यते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
तानि वेदं पुरस्कृत्य प्रवृत्तानि यथाक्रमम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तानि षोडश देवीनां सहस्राणि नराधिप |
९४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तानि सत्त्वमनासाद्य नश्यन्ति विपुलान्यपि ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
तानि सत्यमुखान्याहुर्व्राह्मणा ये मनीषिणः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
तानि सम्यक्प्रणीतानि व्राह्मणानां महात्मनाम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
तानि सर्वाणि गत्वा स प्रभासमुपजग्मिवान् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तानि सर्वाणि जीर्णानि साम्प्रतं नौ रणाजिरे |
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
तानि सर्वाणि तिष्ठन्ति भवत्येव विशेषतः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
व्राह्मण उवाच
तानि सर्वाणि तीर्थानि इतः प्रभृति चैव ह |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
तानि सर्वाणि दुःखानि प्राप्नोति वितथं व्रुवन् ||
७५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
धृतराष्ट्र उवाच
तानि सर्वाणि भगवञ्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
तानि सर्वाणि मनसा विनिश्चित्य तपोधनः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
तानि सर्वाणि संय़म्य युक्त आसीत मत्परः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
तानि सर्वाणि सन्धाय़ मनःषष्ठानि मेधय़ा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तानि सर्वाण्यतीतं च समपश्यत्ततोऽसितः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन्पर्यचरं तदा ||
१०६ ग
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तानि सर्वाण्युपादाय़ शीघ्रमागम्यतामिति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
तानि सूक्ष्माणि सत्त्वस्था विमुक्तानि शरीरतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेय़ं पुरा मही ||
४८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
तानिमाः परिदेवन्ति दुःखार्ताः परमाङ्गनाः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तानिमे भरतश्रेष्ठ प्राप्नुवन्तु महारथाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
तानिषूनिषुभिः कर्णो वारय़ित्वा महामृधे |
१२ क