शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तथा यान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा यान्तौ तदा तात तावच्युतय़ुधिष्ठिरौ |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
तथा युक्तश्चिरं राष्ट्रं भोक्तुं शक्यसि पालय़न् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
तथा युक्तेन मनसा प्राज्ञो गच्छति तां गतिम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
तथा युधिष्ठिरस्तूर्णं भीमसेनश्च पाण्डवः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा युधिष्ठिरस्यापि राज्ञो मङ्गलसंहिताः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
तथा युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पाण्डवः |
३४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा यौवनजं दर्पमास्थिते ते सुते नृप |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा रक्ताङ्गुलितलः पद्मपत्रनिभः शुभे |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
तथा रक्षस्व कौन्तेय़ं राक्षसेभ्यो द्विजोत्तम ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
तथा रजस्तमःकर्माण्युत्सृज्य प्राप्नुय़ात्सुखम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तथा रथशतं साग्रं पत्तींश्च शतशोऽपरान् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा रथसहस्राणि पदातीनां च भारत |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तथा राजगुणाश्चैव सेनापतिगुणाश्च ये |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
तथा राजन्नर्धरथाश्च के चि; त्तथैव तेषामपि कौरवेन्द्र ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
तथा राजन्यो रक्षणं वै प्रजानां; कृत्वा धर्मेणाप्रमत्तोऽथ दत्त्वा |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
तथा राजर्षय़ः सर्वे निवसन्ति गतव्यथाः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा राजर्षय़ः सर्वे व्राह्मणाश्च तपोधनाः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
तथा राजा पृथुकर्मा दिलीपो; दिवं प्राप्तो गोप्रदाने विधिज्ञः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तथा राजा महेष्वासो जलसन्धो महावलः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा राजा वसुमना वलाक्षः सुप्रतर्दनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
तथा राज्ञः परं सत्यान्नान्यद्विश्वासकारणम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तथा राज्ञो दन्तवर्णा वृहन्तो; रथे युक्ता भान्ति तद्वीर्यतुल्याः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
तथा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सूत; सदाशंसे वहुपुत्रस्य वृद्धिम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
तथा राज्ञो वदेः सर्वान्ये युद्धाय़ाभ्युपागताः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तथा राज्ञो ह्यर्थय़ुक्तानमात्या; न्दौवारिकान्ये च सेनां नय़न्ति |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
तथा रुद्रान्वसूंश्चापि विद्धि मत्प्रभवान्द्विज ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तथा रुधिरगन्धेन योधाः कश्मलमाविशन् ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तथा रेजुर्महाराज मिश्रिता रणमूर्धनि ||
१३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
तथा रोगाभिभूतस्य नित्यं कृच्छ्रगतस्य च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा रोहितकारण्यं मरुभूमिश्च केवला ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान्दिव्याभरणभूषितान् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा लालप्यमानां तां निशम्य परवीरहा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा लालप्यमाने तु धर्मराजे युधिष्ठिरे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
तथा लोकभय़ाच्चैव क्षन्तव्यमपराधिनः ||
३१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
तथा लोका मानुषा ये च दिव्याः; प्रजापतेश्चापि ये वै महान्तः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा लोकान्तकृच्छ्रीमान्यमः साक्षात्प्रतापवान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
तथा लोभाभिभूताश्च चरिष्यन्ति महीमिमाम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तथा वचनमुक्तोऽस्मि करिष्यामि च तत्तथा |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
तथा वचनमुक्तोऽस्मि त्वय़ैतत्पितृमातृवत् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
तथा वज्रेण भगवानमर्षाकुललोचनः ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वदति वार्ष्णेय़े धर्मराजे च भारत |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वने तान्वसतः प्रवीरा; न्स्वाध्याय़वन्तश्च तपोधनाश्च |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
तथा वरैश्छन्द्यमाने राज्ञा पारिक्षितेन ह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तथा वर्णा ज्ञानहीनाः पतन्ते; घोरादज्ञानात्प्राकृतं योनिजालम् ||
८८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तथा वर्तति सङ्ग्रामे गजवाजिजनक्षय़े |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
तथा वर्तस्व मान्धातश्चिरं चेत्स्थातुमिच्छसि ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वर्षसहस्राय़ कुन्तीपुत्रेण धीमता |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः |
११ क