वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम् |
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
त्रिरह्नस्त्रिर्निशाय़ाश्च सवासा जलमाविशेत् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
त्रिरात्रं द्विस्त्रिरात्रं वा तय़ोः पुष्टिर्न विद्यते ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
त्रिरात्रं न तु धर्मज्ञैर्विहितं व्रह्मवादिभिः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
त्रिरात्रं वाय़ुभक्षः स्यात्कर्म च प्रथय़ेन्नरः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रमुषितः शाकं भक्षय़ेन्निय़तः शुचिः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रमुषितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रमुषितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रमुषितस्तत्र तर्पय़ेत्पितृदेवताः |
८० क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तय़न् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
त्रिरात्रोपोषितः श्रुत्वा गोमतीं लभते वरम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रोपोषितः स्नात्वा मुच्यते व्रह्महत्यया |
१३२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रोपोषितश्चैव भवेत्तुल्यो नराधिप ||
१५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा मुच्यते व्रह्महत्यया ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रोपोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रोपोषितो राजन्नुपवासपराय़णः |
१६५ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रोपोषितो राजन्सर्वकामानवाप्नुय़ात् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
त्रिरात्रोपोषितो विद्वान्सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
१३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिलक्षं भाजनं राजंस्तुलार्धमभवन्नृप ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
त्रिलोकगोप्त्रीं ये गङ्गां संश्रितास्ते दिवं गताः ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिलोकपथगा गङ्गा दुहितृत्वमुपेय़ुषी ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्महत्यो उवाच
त्रिलोकपूजिते देवे प्रीते त्रैलोक्यकर्तरि |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
त्रिलोकविक्रमे व्रह्मन्नुत्तरां दिशमाश्रितम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
त्रिलोकविख्यातगुणं त्वं विप्रं जनय़िष्यसि |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
त्रिलोकेशं सुरपतिं गत्वा पश्यतु वासवम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
त्रिवन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्र; स्त्रिवृच्छिराश्चतुरस्रश्च तस्य ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
त्रिवर्ग इति विख्यातो गण एष स्वय़म्भुवा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
त्रिवर्गगुणनिर्वृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
त्रिवर्गनिरता नित्यं धर्मोऽर्थः काम इत्यपि ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिवर्गमुख्यस्य समीरणस्य; देवेश्वरस्याप्यथ वाश्विनोश्च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
त्रिवर्गविदितार्थश्च युक्तचारोपधिश्च यः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
त्रिवर्गश्चापि यः प्रोक्तस्तमिहैकमनाः शृणु |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
त्रिवर्गहन्ता चान्येषामात्मकामानुवर्तकः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिवर्गहीनोऽपि हि विन्दतेऽर्थं; तस्मादिदं लोकहिताय़ गुह्यम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडानुवन्धास्त्रय़ एव च |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
त्रिवर्गे सप्तधा व्यक्तं यो न वेदेह कर्मसु |
१२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
त्रिवर्गो यस्य विदितः प्राग्ज्योतिः स विमुच्यते |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिवर्गोऽत्र समासक्तो राजधर्मेषु कौरव |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
त्रिवर्गोऽत्र सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
त्रिवर्गोऽय़ं धर्ममूलो नरेन्द्र; राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिवर्गय़ुक्ता प्राज्ञानामारम्भा भरतर्षभ |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिवर्णाः परिघाः सन्धौ भानुमावारय़न्त्युत ||
२१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिवर्णाः श्यामरूक्षान्तास्तथा भस्मारुणप्रभाः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
त्रिवारः सप्तवारश्च वाल्मीकिर्द्वीपकस्तथा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिविक्रम नमस्तेऽस्तु शङ्खचक्रगदाधर ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
त्रिविधं प्रतिपत्तव्यमर्थवादाशिषः स्तवाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
त्रिविधं मार्गमासाद्य व्यक्ताव्यक्तमनाश्रय़म् ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिविधं संस्थिता ह्येते पञ्च पञ्च पृथक्पृथक् |
१४ क