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शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तथा वलादहं पृथ्वीं सर्वभूतहिताय़ वै ||
७१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
तथा वलेन राजेन्द्र न समोऽस्तीति चिन्तय़ेत् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वशः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वस्त्राण्यलङ्कारं भक्ष्यं पेय़ं च शोभनम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वहुविधं कृष्णां विलपन्तीं धनञ्जय़ः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
तथा वहुविधं राजा रूपं कुर्वीत धर्मवित् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
तथा वाक्काय़मनसां निय़मः कामतोऽन्यथा ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तथा वाचमथाभीक्ष्णं व्राह्मणोऽर्जुनमव्रवीत् |
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
तथा वार्तां समीक्षेत कृतलक्षणसंमिताम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तथा विक्रोशमानस्य फल्गुनस्य ततस्ततः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तथा विक्षोभ्यमाणा सा पार्थेन तव वाहिनी |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
तथा विचित्रवीर्यश्च भीष्मेण परिपालितः |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विट्शूद्रसङ्घानां महान्व्यतिकरोऽभवत् |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विट्शूद्रसङ्घानामभवत्सुप्रिय़स्तदा ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विट्शूद्रसङ्घाश्च तथान्ये म्लेच्छजातय़ः |
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
तथा विदध्यां सुश्रोणि कृत्यस्यास्य शुचिस्मिते |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तथा विधत्स्व कल्याणि त्वां वय़ं शरणं गताः ||
११६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तथा विधत्स्व भद्रं ते त्वं हि नः परमा गतिः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
तथा विधौ प्रवृत्ते तु सर्व एव महर्षय़ः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विनिकृतामित्रैर्याहमिच्छामि जीवितुम् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तथा विनिहते सैन्ये पश्य दुर्योधनं स्थितम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विनिय़ताः सर्वे ये च तेषां पदानुगाः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विनेता च गतिश्च कृष्णे; तवात्मजानामपि रौक्मिणेय़ः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
तथा विप्रस्याश्रमाः सर्व एव; पुरा राजन्व्रह्मणा वै निसृष्टाः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
तथा विमथितं तेन त्र्यङ्गं तव वलं महत् |
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तथा विमनसं दृष्ट्वा भीमसेनं घटोत्कचः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तथा विमुक्तः प्रजहाति दुःखं; विध्वंसते लोष्ट इवाद्रिमर्च्छन् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
तथा विराटद्रुपदौ वृद्धौ सहसुतौ नृपौ |
६१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विराटनगरे कीचकेन भृशार्दिताम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विराटनगरे कुरुभिः सह सङ्गरे |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विराटनगरे योन्यन्तरगतैरिव |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विराटनगरे श्रूय़ते महदद्भुतम् |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
तथा विराटस्य पुरे समेता; न्सर्वानस्मानेकरथेन जित्वा |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तथा विलपमाने तु सव्यसाचिनि तं प्रति |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विलप्योपरता भर्तुः पादौ प्रगृह्य सा |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
तथा विवसनां दीनां स्मरन्त्यद्यापि पाण्डवाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
तथा विविधशीलानामपि सम्भव उच्यते |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विविशतुश्चोभौ सम्प्रहृष्टनराकुलम् ||
२४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विशसनं कृत्वा पुत्रशत्रुगणस्य ते |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
तथा विष्णुः केशवोऽप्यप्रधृष्यो; लोकत्रय़स्याधिपतिर्महात्मा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विष्णुसमः प्रीतिं वर्धय़िष्यति तेऽर्जुनः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तथा विसञ्ज्ञेषु परेषु पार्थः; स्मृत्वा तु वाक्यानि तथोत्तराय़ाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
तथा विसर्गमर्हन्ति न यथा प्रथमे तथा ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
तथा वीरो दाशरथिश्च रामो; ये चाप्यन्ये विश्रुताः कीर्तिमन्तः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तथा वुद्धिप्रदीपेन दूरस्थं सुविपश्चितः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
तथा वुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम् ||
४० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
व्राह्मण उवाच
तथा वुद्धिरिय़ं वेत्ति वुद्धिरेव धनं मम ||
४ ख