द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
सपत्ना ग्लानमनसो लव्धलक्ष्या विशेषतः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः ||
७७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
सपत्नानृध्यतो दृष्ट्वा हानिमात्मन एव च ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीय़मानं निशाम्य च |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
सपत्नान्सव्यतः कुर्मि सव्यसाचिन्निमान्कुरून् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
सपत्नेनावहासो हि स मां दहति भारत ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
सपत्रपुङ्खः पृथिवीं विवेश रुधिरोक्षितः ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
सपर्वतवनद्वीपा हतद्विड्भूः ससागरा |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
सपर्वतवनद्वीपां चक्रुर्भूतधरां तदा ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सपर्वतवनद्वीपां मा राजन्विमना भव ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
सपर्वतवना देवी सग्रामनगराकरा |
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
सपर्वतवना भीम सहस्थावरजङ्गमा ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सपर्वतवना राजंश्चचाल सुभृशं तदा |
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
सपर्वतवनामुर्वीं ससागरवनामिमाम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
सपर्वतवनोद्देशा दक्षिणा वै स्वय़म्भुवा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप ||
१४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
सपादरक्षानवधीद्वज्रेणारीनिवारिहा ||
८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सपादरक्षैः संय़ुक्ताः सोत्तराय़ुधिका यय़ुः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
सपुत्रं निहतं दृष्ट्वा कर्णं राजा युधिष्ठिरः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
सपुत्रं विविधैर्भोगैर्योजय़िष्यति पूजय़न् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
सपुत्रं सहसेनं च द्रोणपुत्रो न्यवारय़त् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सपुत्रः पुरुषव्याघ्रः संशान्तः पार्थतेजसा |
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
सपुत्रदारः शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
सपुत्रदारमुञ्छन्तमाविवेश द्विजोत्तमम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
सपुत्रदारांस्तान्हत्वा तद्रक्षो भक्षय़त्युत ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
सपुत्रदाराः सुक्रूरा दुर्दर्शनसुनिर्घृणाः |
१३० क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
सपुत्रदारो हि मुनिः पक्षाहारो वभूव सः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
सपुत्रपौत्रान्सामात्यांस्तदा भवति सोऽन्तकः ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
सपुत्रा त्वं प्रसादं नः सर्वेषां कर्तुमर्हसि |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
सपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद्वां कुशलं गृहे |
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
सपुत्रे त्वय़ि वृत्तिं च वर्तते यां नराधिप ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
सपुत्रे वै नरव्याघ्रे नैवाशाम्यत वैशसम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सपुत्रो भरतश्रेष्ठ तस्य भुङ्क्ष्व फलोदय़म् |
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
सप्त ग्राम्याः पशवः सप्त वन्याः; सप्त छन्दांसि क्रतुमेकं वहन्ति |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
सप्त चान्यानि युक्तानि वाजिभिः समलङ्कृतैः ||
२० ग
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सप्त चाष्टौ च त्रिंशच्च साय़कैरनय़त्क्षय़म् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सप्त त्वहं प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यौ ग्रहांस्तथा ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सप्त देवर्षय़स्तात वसिष्ठप्रमुखाः सदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
सप्त देव्यो मय़ाष्टम्यो वासं चेष्यन्ति मेऽष्टधा ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
सप्त दोषाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदय़ाः |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सप्त द्वीपानिमान्व्रह्मन्वर्षेणाभिप्रवर्षति ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सप्त पाण्डवतः शेषा धार्तराष्ट्रास्तथा त्रय़ः ||
३३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सप्त पाण्डवतः शेषा धार्तराष्ट्रास्त्रय़ो वय़म् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
सप्त पिण्डफलान्वृक्षाननलापि व्यजाय़त |
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
सप्त प्रकृतय़ो ह्येतास्तथा स्वाय़म्भुवोऽष्टमः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वाय़ोरमिततेजसः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
सप्त मुख्यान्महामेधानाहरद्यमुनां प्रति ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
सप्त यो धारणाः कृत्स्ना वाग्यतः प्रतिपद्यते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सप्त राज्ञो गुणानेतान्मनुराह प्रजापतिः ||
९९ ख