भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं च पञ्चभिः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं निकृत्य च |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो महाराज नाराचान्वै चतुर्दश |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य व्राह्मणस्य महासुरः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पार्श्वे त्विमे द्वीपाश्चत्वारः संस्थिताः प्रभो |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पार्श्वे महद्दिव्यं शुभं काञ्चनवालुकम् |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पार्ष्णिं ग्रहीष्यामो जवेनाभिप्रय़ास्यतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य पुत्रः पुरे जातः संवृद्धश्च तपोवने |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
तस्य पुत्रः शुचिर्दान्तः कुवलाश्व इति श्रुतः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान्धर्मपराय़णः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
तस्य पुत्रः समभवद्दिलीपो नाम धर्मवित् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य पुत्रः स्वनो नाम पावकः स रुजस्करः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तस्य पुत्रशतं जज्ञे नृपतेः सूर्यवर्चसः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तस्य पुत्रशतं राजन्नासीत्परमधार्मिकम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१३६
भरद्वाज उवाच
तस्य पुत्रस्तदा जज्ञे मेधावी क्रोधनः सदा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत्कर्तुमर्हति ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशय़ः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
तस्य पुत्रा महात्मानो व्रह्मवंशविवर्धनाः |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पुत्रा महेष्वासा जज्ञिरे पञ्च पाण्डवाः ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पुत्रा महेष्वासाः सर्वैः समुदिता गुणैः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
तस्य पुत्रा वभूवुश्च पञ्च राजर्षिसत्तमाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तस्य पुत्राः सुवलिनः शापेनासन्पितुर्वधे |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य पुत्रास्त्रय़ः शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
व्रह्मो उवाच
तस्य पुत्रो जरत्कारोरुत्पत्स्यति महातपाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य पुत्रो दशरथः शश्वत्स्वाध्याय़वाञ्शुचिः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पुत्रो ध्रुवं प्राप्तस्तस्य तस्येति चापरः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
तस्य पुत्रो महानासीज्जह्नुर्नाम नरेश्वरः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तस्य पुत्रो महेष्वासः प्रजातिरिति विश्रुतः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपराय़णः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
तस्य पुत्रो हि भगवन्भीष्मद्रोणमुखै रथैः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तस्य पुत्रोऽतिचक्राम पितरं गुणवत्तय़ा |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
तस्य पुत्रोऽभवदृषेः स तेजस्वी महानृषिः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पुत्रोऽभवद्राजन्विश्वामित्रः प्रतापवान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थदर्शिवान् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
तस्य पुत्रौ महावीर्यौ जातौ भीमपराक्रमौ |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तस्य पुनरुपाध्याय़ः कालान्तरेण गृहानुपजगाम तस्मात्प्रवासात् |
९१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पूजार्थमद्यैव संविधत्स्व परन्तप |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तस्य पूर्वं रथः पृथ्व्याश्चतुरङ्गुल उत्तरः |
१०७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पूर्वं शिरो ग्रस्तं पुच्छमस्य निगीर्यते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
तस्य पूर्वमजाय़न्त दश तिस्रश्च भारत |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तस्य पूर्वाभिषेकस्तु भद्राश्वस्य विशां पते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
तस्य पृष्ठमुपारुह्य वहुरत्नाचितं शुभम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तस्य पौरवकालिङ्गौ काम्वोजश्च सुदक्षिणः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
तस्य प्रक्षालनार्थाय़ कुम्भस्तत्रोपकल्पितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात् ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
तस्य प्रणादेन धरा दिशश्च; खं द्यौर्नगाश्चापि चचाल सर्वम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
तस्य प्रतिक्रिय़ा तात मय़ेय़ं प्रसमीक्षिता |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य प्रभवमन्विच्छन्विचचार समन्ततः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
तस्य प्रमाणं प्रव्रूहि ततो वक्ष्यसि पिप्पलम् ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
तस्य प्रमुखतो राजन्येऽवर्तन्त महारथाः |
१३ क