द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तौ वीरौ तं शर्वं पार्षदैः सह |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तौ वीरौ रावणं दूषणानुजौ |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तथेत्युक्त्वा तु सा देवी स्रवन्नेत्रजलाविला |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
तथेत्युक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीय़त |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
तथेत्युक्त्वा द्विजश्रेष्ठः प्रादात्कन्यां महीपतेः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
तथेत्युक्त्वा प्रदुद्राव स चास्तीको मुदा युतः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा महाकाय़ः समाहूय़ घटोत्कचम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा महावाहुर्घटोत्कचमुपाद्रवत् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
तथेत्युक्त्वा विहिते चैव तस्मिं; स्ततो यय़ौ साश्रमं कौशिकस्य ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
तथेत्युक्त्वा शुभे काले ज्ञानतत्त्वं ददौ तदा ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वा ह्रदं तं वै माय़यास्तम्भय़त्प्रभो ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वागमत्तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
तथेत्युक्त्वाण्डजः कन्यां वैदर्भस्य विशां पते |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
तथेत्युक्त्वान्वगच्छत्तं ततो दानवसूदनः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तथेत्युक्त्वार्जुनः क्षिप्रं शिष्टान्संशप्तकांस्तदा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यत वने स्त्रिय़ः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
तथेत्युवाच तां याजो राज्ञः प्रिय़चिकीर्षय़ा |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तथेत्युवाच संहृष्टो वेदाभ्यासे दृढव्रतः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्मं सम्पूज्य चाभिभो |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
तथेत्येवाव्रवीद्वाक्यं पाण्डवेनाभिनिर्जितः ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तथेत्येवाव्रुवन्सर्वे प्रतिजज्ञुश्च तां गिरम् ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
तथेदं मामकं सैन्यं काल्यते शत्रुतापन ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वासुदेव उवाच
तथेदमर्थवद्वाक्यमुक्तं ते भरतर्षभ ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
अष्टावक्र उवाच
तथेदानीं मय़ा कार्यं यथा वक्ष्यति मां भवान् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
तथेन्द्रलोके निजघान दैत्या; नसङ्ख्येय़ान्कालकेय़ांश्च सर्वान् |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
तथेन्द्रिय़निरोधेन महानात्मा प्रकाशते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
तथेन्द्रिय़ाकुलीभावे ज्ञेय़ं ज्ञाने न पश्यति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
तथेन्द्रिय़ाणि मनसा संय़न्तव्यानि भिक्षुणा ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
तथेन्द्रिय़ाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
तथेन्द्रिय़ाण्याविशते शरीरी; हुताशनं वाय़ुरिवेन्धनस्थम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
तथेन्द्रिय़ाण्युपादाय़ वुद्धिर्मनसि वर्तते ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
तथेमं वलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मनः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तथेमां विपुलां सेनां गुप्तां पार्थ त्वय़ानघ |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
तथेमे पुरुषव्याघ्राः सहाय़ास्तव पार्थिव |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
तथेमे मुदिता नागाः स्वय़ूथकुलशोभिनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तथेमे सर्वपाञ्चाला दुःषन्तपरमेष्ठिनोः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तथेमे सुहृदः सर्वे भ्रश्यते मे मनो भृशम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
तथेह पञ्चेन्द्रिय़दीपवृक्षा; ज्ञानप्रदीप्ताः परवन्त एव ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
तथैतदन्तरं विद्यात्क्षेत्रक्षेत्रज्ञय़ोर्वुधः |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
तथैतदुपपन्नार्थं वर्णय़न्ति महर्षय़ः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
तथैतल्लाघवं मन्ये तव कर्म जनार्दन ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
तथैतान्पातय़िष्यामि यथा यास्यन्ति न क्षय़म् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
तथैत्य वाय़सं हंसो जलक्लिन्नं सुदुर्दशम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रिय़ं तव |
६९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तथैनमन्वनृत्यन्त देवकन्याः सहस्रशः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
तथैव कतमं युद्धं यस्मिन्कृष्णा जिता त्वय़ा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
तथैव कथितो वंशो मय़ा गार्त्समदस्तव |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तथैव कर्णं समरे छादय़ामास पाण्डवः ||
१३ ख