chevron_left  तंarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
तं विसञ्ज्ञं निपतितं सूतः सम्प्रेक्ष्य संय़ुगे |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तं विसञ्ज्ञं महाराज किरीटिभय़पीडितम् |
१२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तं विसञ्ज्ञं समालोक्य युय़ुधानशरार्दितम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
तं विसञ्ज्ञमथो ज्ञात्वा त्वरमाणोऽस्य सारथिः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
तं विसञ्ज्ञमपोवाह संय़न्ता रथवाजिनाम् |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तं विसृज्य रणे कर्णः पाञ्चालांस्त्वरितो यय़ौ |
९८ क
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
तं विस्मय़न्ती शनकैः सञ्ज्ञाभिरिदमव्रवीत् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
तं वीरशय़ने वीरं शय़ानं कुरुसत्तमम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
तं वीरशय़ने वीरं शय़ानं पुरुषर्षभम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तं वृक्षमादाय़ रिपुप्रमाथी; दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तं वृहन्तो महाकाय़ा युय़ुत्सुमवहन्रणे ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
तं वेणीकृतकेशान्तं भीमधन्वानमर्जुनम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
तं वेदाश्चाश्रमाश्चैव नानातनुसमास्थिताः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
तं वै गच्छस्व नृपते स त्वां संय़ाजय़िष्यति ||
१९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तं वै चतसृभिः स्त्रीभिरन्वितं पाण्डुनन्दनः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तं वै चतुर्भिः प्रतिविध्य वीरो; नप्ता शिनेरभ्यपतद्रथेन ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
तं वै तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नः पराक्रमी |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तं वै तीर्थमुपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
तं वै दृष्ट्वा प्राह शक्रो महात्मा; वृहस्पतेः संनिधौ हव्यवाहम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
तं वै द्विजातिप्रवरं तदा शापभय़ान्नृप ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तं वै द्विपं प्रेषय़ामास तूर्णं; वधाय़ राजन्द्रुपदात्मजस्य ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तं वै न ममृषे द्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजय़म् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
तं वै परं वेदविदः प्रपन्नाः; परं परेभ्यः प्रथितं पुराणम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
तं वै मन्ये पितरं मातरं च; तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन् ||
१९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
तं वै यान्तं संनिधौ केशवस्य; त्वरन्तमेकं सहसैव वभ्रुम् |
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
तं वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा; अजातशत्रुर्विदुरं यथावत् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
पितो उवाच
तं वै वधूः स्थिता साध्वी व्राह्मणप्रिय़काम्यया |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तं वै विंशतिसाहस्राः पाञ्चालानां नरर्षभाः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
तं वै विप्राः पर्यभवंश्च शिष्या; स्तं च ज्ञात्वा विप्रकारं गुरुः सः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
तं वै विमनसं दृष्ट्वा सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमन्तिकात् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
तं वै व्रूहि महावाहो सर्वशस्त्रभृतां वरम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तं वै शतमुखः प्राह योगो भवतु मेऽद्भुतः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
तं वै शाकुनिकं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
तं वै श्यामं गुडाकेशं सिंहविक्रान्तगामिनम् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमय़न्त्युत ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
तं वै सदा कामचरमनुपस्तीर्णशाय़िनम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव वान्धवम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तं व्यालनानाविधगूढसारं; गजाश्वपादातरथौघपक्षम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तं व्यूहराजं ददृशुस्त्वदीय़ा; श्चतुश्चतुर्व्यालसहस्रकीर्णम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
तं व्रह्मास्त्रेण सौमित्रिर्ददाहाद्रिचय़ोपमम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
तं व्राह्मणं पुरस्कृत्य पाञ्चाल्याश्च स्वय़ंवरम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
तं व्राह्मणं भोजय़ित्वा पुनरेव समाह्वय़त् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
तं व्राह्मणमहं पूर्वमुक्तवान्भुजगोत्तम ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्राह्मण उवाच
तं व्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद्द्विजः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
तं व्राह्मणा वेदविदो जुषन्ति; तस्यादित्यो भामुपय़ुज्य भाति |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
तं व्राह्मणा व्रह्ममन्त्रैः स्तुवन्ति; तस्मै हविरध्वर्यवः कल्पय़न्ति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
तं व्राह्मणाः सर्व एव तत्यजुः सपुरोहिताः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
तं व्राह्मणाश्च वृद्धाश्च पौरजानपदैः सह |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
तं व्राह्मणाश्चाभ्यवदन्प्रसन्ना; मुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ||
५ ख