वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तथैव पुष्करं राजंस्तीर्थानामादिरुच्यते ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव पृथिवीं लव्ध्वा व्राह्मणा वेदपारगाः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तथैव पौरवं युद्धे धृष्टकेतुर्महारथः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
तथैव पौरुषं लिङ्गमनुमानाद्धि पश्यति ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
तथैव प्रतिजग्राह वन्येन हविषा तथा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
तथैव प्रिय़वादेन नैपुणेन शमेन च |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
तथैव फल्गुनेनापि यदुक्तं तत्त्वय़ा श्रुतम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
तथैव भगदत्तश्च श्रुताय़ुश्च महावलः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव भगवन्तौ तौ नरनाराय़णावृषी ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव भगवान्सोमो नक्षत्रैः सह गच्छति ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव भारतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् |
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तथैव भीमसेनस्य द्विषताभिहता गदा |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तथैव भीमसेनस्य पार्षतस्य च भारत |
८१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तथैव भीमसेनेन द्विषते प्रेषिता गदा |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
तथैव भीमसेनेन लोकः संवदते भृशम् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव भीमसेनोऽपि धृतराष्ट्रं जनाधिपम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो वशी |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव भीमसेनोऽपि यमौ च पुरुषर्षभौ |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तथैव भीमसेनोऽपि राक्षसश्च घटोत्कचः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
धृतराष्ट्र उवाच
तथैव भूरिश्रवसि किमासीद्वो मनस्तदा ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
तथैव भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः पुरुषर्षभाः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव मत्स्यराजानं सुशर्मा युद्धदुर्मदः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव मद्रराजानं शल्यं वलवतां वरम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तथैव मद्रराजोऽपि भीमं दृष्ट्वा महावलम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तथैव मरधाश्चीनास्तथैव दशमालिकाः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
तथैव मलदिग्धाङ्गी परिष्वज्य शुचिस्मिता |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव मां तैः परिरक्ष्यमाणा; मादास्यसे कर्कटकीव गर्भम् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तथैव मारय़ामास विनर्दन्तमरिन्दमम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तथैव मित्रं पुरुषं वरुणं प्रकृतिं तथा ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तथैव मुचुकुन्दस्य शिवेरौशीनरस्य च |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव मुदिता भद्रा तामुवाचैवमस्त्विति ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
तथैव मृगजातीभिरन्याभिरुपशोभसे |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
युधिष्ठिर उवाच
तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रव्रूहि पार्थिव ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव यः क्षमाकाले क्षत्रिय़ो नोपशाम्यति |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
तथैव यशसा पूर्णे मय़ि को विस्मय़िष्यति ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तथैव यातु धानानां गदामुद्गरधारिणाम् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तथैव युधि विक्रान्तो मागधः परवीरहा |
८५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
तथैव युय़ुधानेन सृष्टाः शतसहस्रशः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तथैव युय़ुधानोऽपि द्रोणं वहुभिराशुगैः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
तथैव युय़ुधानोऽपि वृष्णीनां प्रवरो रथः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
तथैव योगज्ञानं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ||
६५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
तथैव योगविहितं न सिध्येत्कर्म यन्नृप |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
तथैव रथमारुह्य नाप्सु चर्या विधीय़ते ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
तथैव रथमास्थाय़ कृतवर्मा महारथः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तथैव रथवाहिन्यः प्रतिव्यूह्य व्यवस्थिताः ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
तथैव रथशालासु प्रादुरासीद्धुताशनः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तथैव रथिनं नागः क्षरन्गिरिरिवारुजत् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
तथैव रथिनः सर्वे हस्त्यश्वं यच्च किञ्चन |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तथैव रथिनां श्रेष्ठः क्षेमधूर्तिर्विशां पते |
४२ क