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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
नेत्रैरागतविक्लेदैः परिवार्य स्थिताभवन् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
नेत्रोद्भवं संमुमुचुर्दशार्हा; दुःखार्तिजं वारि महानुभावाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
नेत्रय़ोः प्रतिपद्यन्ते वहन्त्यस्तैजसं गुणम् ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
व्यास उवाच
नेदं कृच्छ्रं चिरतरं सहेदिति मतिर्मम ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
नेदं कृच्छ्रमनुप्राप्तो भवान्स्याद्वसुधाधिप |
१ क
वन पर्व
अध्याय २३५
चित्रसेन उवाच
नेदं चिकीर्षितं तस्य कुन्तीपुत्रो महाव्रतः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
नेदं चिरात्क्षिप्रमिदं भविष्य; त्यावर्ततेऽसावभिय़ामि चैनम् ||
१०० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं जानाति गहनं वनं राक्षससेवितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८०
युधिष्ठिर उवाच
नेदं प्रति धनं शास्त्रमापद्धर्ममशास्त्रतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं मद्व्याहृतं कुर्यात्सर्वलोकोऽपि वै मृषा |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं मनुष्याः श्रद्दध्युर्न हीदं तेषु विद्यते |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं युक्तं मनुष्येषु योऽय़ं सन्दृश्यते महान् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं युक्तं महीपाल यादृशं वै त्वमुक्तवान् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १५०
कुन्त्यु उवाच
नेदं लोभान्न चाज्ञानान्न च मोहाद्विनिश्चितम् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथञ्चन |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
नेदं सम्यग्व्यवसितं केशवागमनं तव ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
नेदं सम्यग्व्यवसितं महर्षे कर्म वैकृतम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
नेदमद्य युधा शक्यमिन्द्रेणापि सहामरैः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण्यु उवाच
नेदमल्पात्मना शक्यं वेदितुं नाकृतात्मना |
१ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
नेदमस्ति कुलं सर्वं न वय़ं न च नो गृहाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
नेदमस्तीति पुरुषा हतोत्साहा हतौजसः |
८४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
नेदमस्तीति सञ्चिन्त्य कर्णस्य निधनं प्रति ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः; सम्प्राद्रवद्यत्र पार्था वभूवुः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
नेदानीं जीविते वुद्धिः कार्या धर्मचिकीर्षय़ा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
नेदानीं मामिहासाद्य राजधर्मो भवेन्मृषा ||
१०७ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
नेदानीं शरनिर्भिन्नाः शोचध्वं निहता मय़ा ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
नेदानीं हि प्रवेक्यामि नगरं वृषपर्वणः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
नेदानीमतिनिर्वन्धं शोके कर्तुमिहार्हसि |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
नेदुः सेदुश्च मम्लुश्च वभ्रमुश्च दिशो दश ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
नेदुर्दुन्दुभय़श्चापि समन्तात्सुमहास्वनाः |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
नेदृशं ते पुनर्वाच्यं यदि जीवितुमिच्छसि ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
नेदृशं वन्धुमासाद्य वान्धवः सुखमेधते ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
नेदृशं शक्नुय़ात्कश्चिद्रणे कर्तुं पराक्रमम् |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
नेन्दुः समः स्यादसमो हि वाय़ु; रुच्चावचं विषय़ं यः स वेद ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
नेन्द्रस्य न च रुद्रस्य नापि वैश्रवणस्य च ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
नेन्धनेन जय़ेदग्निं न पानेन सुरां जय़ेत् ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
नेमां हिंस्युर्वने वालां क्रव्यादा मांसगृद्धिनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
नेमानि दृष्टान्तविधौ स्मृतानि; क्षात्रे हि सर्वं विहितं यथावत् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
नेमानि हि त्वदीय़ानि सोढुं शक्ष्यन्ति मे वलम् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
नेमामर्हसि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
नेमिघोषश्च रथिनां खुरघोषश्च वाजिनाम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
नेमिघोषेण महता कम्पय़न्तो वसुन्धराम् ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
नेमिनिर्ह्रादसंनादो महास्त्रोदय़पावकः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
नेमे जातु न युध्येरन्निति मे धीय़ते मतिः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
नेमे मृगाः स्वर्गजितो न वराहा न पक्षिणः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
मन उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
घ्राण उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
१० क