सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
न च स्म प्रतिपद्यन्ते शस्त्राणि वसनानि च ||
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
न च स्म लभते भार्यां वृद्धोऽय़मिति शौनक ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
न च स्म वैशसं घोरं कौरवान्तकरं भवेत् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
न च स्यात्पतितो राजन्पङ्क्तिपावन एव सः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
न च स्वतां निय़च्छन्ति तादृशः सत्त्वसङ्क्षय़ः ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
न च स्वपिषि जागर्षि न्युव्जः शेषे परन्तप |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न च स्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
न च हिंस्योऽभ्युपगतः सामन्तो वृद्धिमिच्छता |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
न चकर्थ च मे वाक्यमुच्यमानः पुनः पुनः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
न चकार भय़ं प्राप्ते भय़े महति मारिष ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
न चकार व्यथां राजन्भास्करो जलदैर्यथा ||
८१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न चक्रुस्ते रुजं तस्य रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महामनाः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
न चक्षमे सुसङ्क्रुद्धस्तोत्त्रार्दित इव द्विपः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
न चक्षुर्भ्यां न कर्णाभ्यां संशृणोति समीक्षते |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषय़ेत्क्वचित् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषय़ेदपि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो; न चापि संस्पर्शमुपैति किञ्चित् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो; न पश्यति स्पर्शमिन्द्रिय़ेन्द्रिय़म् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
न चचाल ततो देशाद्वुवुधे न च किञ्चन ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
न चचाल तदा राजन्सात्यकिः सत्यविक्रमः ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
न चचाल महाराज सर्वसैन्यस्य पश्यतः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न चचाल रथोपस्थाद्भीमसेनो महावलः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
न चचाल रथोपस्थे मैनाक इव पर्वतः ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
न चण्डिका जङ्गमा नो करेणु; र्न वारिसोमं प्रपिवामि वह्ने |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
न चतुर्विंशकोऽग्राह्यो मनुजैर्ज्ञानदर्शिभिः ||
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न चत्वरे निशि तिष्ठेन्निगूढो; न राजन्यां योषितं प्रार्थय़ीत ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
न चन्द्रसूर्यौ न तरुं पुंनाम्नो या निरीक्षते |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
न चरत्यधिकारेण सेवितं द्विषतो न च |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
न चाकामः शकुनिना देविताहं; न चेन्मां धृष्णुराह्वय़िता सभाय़ाम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
न चाकामेन दातव्यं तिलश्राद्धं कथञ्चन ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
न चाकृतास्त्रेण न हीनजेन; लक्ष्यं तथा पातय़ितुं हि शक्यम् ||
२६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
न चाक्षेपान्न पाण्डित्यान्न क्रोधान्न विवक्षय़ा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः ||
२३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
न चागाद्द्वैरथं जिष्णुर्दिष्ट्या तं भरतर्षभ |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद्राजा सुय़ोधनः ||
३४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न चाज्ञातां स्त्रिय़ं गच्छेद्गर्भिणीं वा कदाचन ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
न चातपाध्वसन्तप्तः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
न चातिधैर्येण चरेद्गुरुतां हि व्रजेत्तथा |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
न चातिमानी न च हीनवृत्तो; रूक्षां वाचं रुशतीं वर्जय़ीत ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
न चातिवर्तसे धर्मं वेलामिव महोदधिः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
न चातिष्ठत्पितुः शास्त्रे वलदर्पविमोहितः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
न चातीतानि शोचन्ति न चैनान्प्रतिजानते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
न चात्मगतमैश्वर्यमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
न चात्मग्रहणे युक्तो नावमानी न चाक्रिय़ः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
न चात्मनः प्रमाणं ते धर्मं जानन्ति किञ्चन ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रिय़ेषु विभागशः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
न चात्र तिर्यङ्न पुरो न पश्चा; न्नोर्ध्वं न चाधः प्रचरेत कश्चित् ||
५३ ख