chevron_left  तान्निवर्तध्वमित्याहarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तान्निवार्य शराञ्शूरः शैनेय़ः कृतहस्तवत् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तान्निवार्य शरौघेण शक्रसूनुर्महारथः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तान्निवार्यार्जुनिर्वाणैः क्राथपुत्रमथार्दय़त् |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तान्निवृत्तरथान्दृष्ट्वा पाण्डवान्सा महाचमूः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तान्निवृत्तान्रणे शूरान्राधेय़ः शत्रुतापनः |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
तान्निवृत्तान्समीक्ष्यैव ततोऽन्येऽपीतरे जनाः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्निवेश्य ततो वीरो रामेण सह केशवः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तान्निहत्य महावाहू राधेय़स्यैव पश्यतः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
तान्निहत्य रणे राजन्भारद्वाजः प्रतापवान् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
तान्निहत्य रणे वीरो द्रोणपुत्रो युधां पतिः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तान्निहत्य रणे शूरः पुनर्यास्यति मानुषान् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
तान्निहत्य शरान्द्रौणिर्दश वीरानपोथय़त् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
तान्निहत्य शरान्भीमो दुर्योधनधनुश्च्युतान् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
तान्नैतदस्त्रं सङ्ग्रामे निहनिष्यति मानवान् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
तान्नैवार्था न चानर्था व्यथय़न्ति कदाचन ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तान्नैषि सन्तर्तुमसाधुजुष्टा; न्येन स्म सर्वे निरय़ं प्रपन्नाः ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
तान्न्यवारय़दाय़स्तान्मुहूर्तमिव सात्यकिः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
तान्पक्षनखतुण्डाग्रैरभिनद्विनतासुतः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
तान्पञ्चभल्लैस्त्वरितैः सुमुक्तै; स्त्रिधा त्रिधैकैकमथोच्चकर्त |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तान्पञ्चभिः स त्वहनत्पृषत्कैः; कर्णस्ततः सिंह इवोन्ननाद ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्परीप्स मनुष्येन्द्र मा नेशुः पशवस्तव ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पश्य कुरुशार्दूल समुन्मीलय़ लोचने ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तान्पश्यध्वं पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रा; न्रणे हतांस्तपसा याज्ञसेन्याः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पश्यन्पर्वते रेमे स्ववाहुवलपालितान् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तान्पश्यन्सैन्यमध्यस्थो राजा स्वजनसंवृतः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तान्पाण्डवाः प्रत्यगृह्णंस्त्वरिताः पुत्रगृद्धिनः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
तान्पाण्डुपुत्रश्चिच्छेद नवभिर्नतपर्वभिः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पाद्यमधुपर्कार्हान्मानार्हान्सत्कृतिं गतान् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पालय़ यथान्याय़ं पुत्रांश्च भरतर्षभ ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पालय़ स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पुनर्जीवय़ामास काव्यो विद्यावलाश्रय़ात् |
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
तान्पूजय़स्व सततं दानेन परिचर्यया |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
तान्पूजय़ित्वा सम्प्राप्तान्यथार्हं स महीपतिः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्पूर्वेन्द्रानेवमीक्ष्याभिरूपा; न्प्रीतो राजा द्रुपदो विस्मितश्च ||
३८ ग
विराट पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रकीर्णपताकेन रथेनादित्यवर्चसा |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्यगृह्णात्पुत्रस्ते मद्रराजश्च वीर्यवान् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्यगृह्णादव्यग्रो द्रोणोऽपि रथिनां वरः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्यविध्यच्छैनेय़ः पृथक्पृथगजिह्मगैः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्यविध्यद्गाङ्गेय़स्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्यविध्यद्राजेन्द्र पार्षतः शत्रुतापनः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्यविध्यद्राधेय़ः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ||
१९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रत्युद्गम्य यवनानश्वारोहान्वरारिहा |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रभग्नांस्तथा दृष्ट्वा द्रोणो द्रौणिर्वृहद्वलः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रभग्नांस्तथा द्रौणिः पृष्ठतो विकिरञ्शरैः |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रभग्नान्द्रुतान्कर्णः पृष्ठतो विकिरञ्शरैः |
११९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रभग्नान्द्रुतान्दृष्ट्वा हतोत्साहान्पराजितान् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रभुः कृतमित्युक्त्वा सत्कृत्य च यथार्हतः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रमृद्नन्महेष्वासान्राधेय़ः शरवृष्टिभिः |
७९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रमृद्य शरव्रातैः पाण्डवानां महारथान् |
३८ क