chevron_left  चन्द्रसूर्यावुभौarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासे त्रय़ोदशीम् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रसूर्यौ यथा राजंश्छाद्यमानौ जलागमे ||
७९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रसेनं च सप्तत्या सूतं च नवभिः शरैः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
चन्द्रसेनो भद्रसेनः कीर्तिधर्मा ध्रुवो धरः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रस्तु दितिजश्रेष्ठो लोके ताराधिपोपमः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रहन्तेति यस्तेषां कीर्तितः प्रवरोऽसुरः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
चन्द्रादित्यावुभौ यावद्गगने चरतः प्रभो |
७६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
चन्द्रादित्यौ ग्रहनक्षत्रताराः; सर्वाणि दर्शान्यथ पौर्णमास्यः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
चन्द्रादित्यौ ग्रहास्तारा नक्षत्राणि दिवौकसः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
चन्द्रादित्यौ च धर्मश्च परमेष्ठी तथा वुधः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रादित्यौ महाराज सङ्क्षेपोऽय़मुदाहृतः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वाय़ुना |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रार्कानिलवह्नीनां कान्तिदीप्तिवलद्युतीः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
चन्द्रोदय़ः कामरथो विराटभ्रातरः शुभाः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
चन्द्रोदय़े विवर्तन्तमप्लवः सन्तितीर्षसि ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
चन्द्रोऽभूदग्निवर्णश्च समवर्णे नभस्तले ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
चपलाक्षः किलातीव प्रिय़स्ते मधुसूदन |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
चपलाक्षस्य दाय़ादे मृतेऽस्मिन्पुरुषर्षभ |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
चमसे च शिवोद्भेदे नागोद्भेदे च दृश्यते ||
११८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथय़न्त्युत ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
चमसोन्मज्जनं विप्रास्तत्रापि कथय़न्त्युत |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
चमूं द्रावय़ते क्रोधाद्वृत्रो देवचमूमिव ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
चमूं विगाह्य पार्थानां युध्यन्ते क्षत्रिय़र्षभाः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
चमूं विगाह्य युध्यन्ते नित्यं स्वर्गपराय़णाः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
चमूं विगाह्य शत्रूणां शरशक्तिसमाकुलाम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
चमूस्तु पृतनास्तिस्रस्तिस्रश्चम्वस्त्वनीकिनी |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
चमूहरः सुवेषश्च व्योमारिः शङ्करो भवः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
चम्पकांस्तिलकान्भव्यान्पनसान्वञ्जुलानपि |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
चर क्रोधमिमं त्यक्त्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २२२
शार्ङ्गका ऊचुः
चर खे त्वं यथान्याय़ं पुत्रान्वेत्स्यसि शोभनान् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
शकुन्तलो उवाच
चर तस्य तपोविघ्नं कुरु मे प्रिय़मुत्तमम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन्देवांश्च पूजय़ ||
२१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
चर स्वस्त्ययनं कृत्स्नं भारतानामनामय़म् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
चरंश्च विविधान्मार्गान्मण्डलानि च भारत |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
चरंश्चित्रतरान्मार्गान्कौन्तेय़मभिदुद्रुवे ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
चरक्षां महिरोहीं च तथा जम्वुनदीमपि ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
चरणं मारुतात्मेति प्राणापानौ च तन्मय़ौ |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
चरणांश्चैव केषाञ्चिद्वभञ्ज चरणाय़ुधः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
भीष्म उवाच
चरणावुपसङ्गृह्य स्थितः प्राञ्जलिरव्रवीत् ||
३ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
चरणौ दह्यमानौ च नाचिन्तय़दनिन्दिता |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
चरणौ धर्मकामो वै तपस्वी सुसमाहितः |
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
चरता धर्ममिमं येन त्वय़ाभिज्ञेन कामरसस्याहमनवाप्तकामरसोऽभिहतस्तस्मात्त्वमप्येतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरसः पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
चरता वलमास्थाय़ पाकशासनिना मृधे ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
चरतो मृगय़ां तस्य क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
चरत्यप्सरसां लोके रमते नन्दने तथा ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
चरत्यूर्ध्वं च तिर्यक्च भीमसेनजिघांसय़ा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
चरनेतानि कौन्तेय़ सहितो व्राह्मणर्षभैः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ८६
अष्टक उवाच
चरन्गृहस्थः कथमेति देवा; न्कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
चरन्तं गदय़ा वीरं दण्डपाणिमिवान्तकम् |
२ क