वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
तं वय़ं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रं धनञ्जय़म् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
तं वय़ं सहिताः सर्वे प्रकरिष्याम मारिष ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
जनमेजय़ उवाच
तं शंससि भय़ाविष्टमापन्नमरिकर्षणम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
तं शक्त्या वर्धमानश्च सर्वतः परिवृंहय़ेत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
तं शक्रं कश्मलाविष्टं दृष्ट्वा विष्णुः सनातनः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तं शक्रसदनप्रख्यं दिव्यगन्धं मनोरमम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
तं शप्तुमैच्छत्कुपितो निषधाधिपतिर्नलः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तं शरं शतधा चास्य द्रोणश्चिच्छेद साय़कैः |
१२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तं शरानाददानं च रक्षमाणं च सारथिम् |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तं शरैर्दशभिस्तीक्ष्णैश्चिच्छेद शिनिपुङ्गवः |
१५३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
तं शरौघमहाज्वालमस्त्रार्चिषमरिन्दमम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तं शरौघमहावर्तं शोणितोदं महाह्रदम् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तं शल्यो नवभिर्वाणैर्गार्ध्रपत्रैरताडय़त् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
तं शल्यो नवभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
तं शवं सम्परिष्वज्य वाक्किलान्तर्हिताव्रवीत् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तं शव्दं कुरवोऽजानन्विस्फोटमशनेरिव |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तं शव्दं तुमुलं श्रुत्वा द्रोणो यन्तारमव्रवीत् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तं शव्दं तुमुलं श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तं शव्दं पाण्डवाः श्रुत्वा पर्जन्यनिनदोपमम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तं शव्दं सहसा श्रुत्वा मृगपक्षिसमीरितम् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तं शशाप सुसङ्क्रुद्धो धनदः कुरुनन्दन |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तं शात्रवाणां गणवाधितारं; कर्माणि कुर्वाणममानुषाणि |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तं शिखण्डी च भीमश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
तं शिखण्डी त्रिभिर्वाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तं शिखण्डी रणे यत्तमभ्यधावत दंशितः |
१३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तं शिखण्डी समासाद्य त्वय़ा गुप्तो महारथम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
तं शिलाताडनजडं पर्यधावत्स राक्षसः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
तं शिविः प्रतिविव्याध त्रिंशता निशितैः शरैः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तं शीघ्रमनुय़ुञ्जध्वं संशय़ान्मनसि स्थितान् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तं शीघ्रमभिधावन्तं सम्प्रेक्ष्य कुरवोऽव्रुवन् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
तं शुचिं पण्डितं मत्वा शार्दूलः ख्यातविक्रमः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तं शूरमार्यव्रतिनमस्त्रार्थकृतनिश्रमम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
तं शृणुष्व महाराज मम कीर्तय़तः प्रभो ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तं शैनेय़ः शरव्रातैः क्रुद्धः क्रुद्धमवारय़त् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुताय़ुस्तथाम्वष्ठो व्रजमानं न्यवारय़त् ||
५६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा तु महानादं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्य पाण्डवः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्य मारिष |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तस्य भीष्मस्य रक्षसः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां समुत्थितम् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं त्रैलोक्यत्रासनं महत् |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं पीड्यमानं च माधवम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं तस्य सैन्यास्तव वितत्रसुः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
तं श्रुत्वा निहतं कर्णं द्वैरथे सव्यसाचिना |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
तं श्रुत्वा निय़मं दुःखं वध्वा दुःखान्वितो नृपः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
तं श्रुत्वा पाण्डवो राजंस्तप्यमानं महावने |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
व्यास उवाच
तं श्रुत्वा भृशसन्तप्तं देवराजो वृहस्पतिम् |
३५ क