chevron_left  तदद्भुतमभिप्रेक्ष्यarrow_drop_down
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य द्वारकावासिनो जनाः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमभूद्युद्धं कर्णपाण्डवय़ोर्मृधे |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमभूद्युद्धं द्रोणपाञ्चाल्ययोस्तदा |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षितः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
तदद्भुताकारमहं दृष्ट्वा नगरमुत्तमम् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
तदद्य कुरु राधेय़ कुरुमध्ये मय़ा सह ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्य त्वय़ि पश्यामि क्षत्रिय़े विपरीतवत् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
तदद्य पर्याप्तमतीव शस्त्र; मस्मिन्सङ्ग्रामे तुमुले तात भीमे ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्य मय़ि दाशार्ह यथा पितरि मे तथा ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
तदद्य विदुर प्राप्य राजानं मम शासनात् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
तदद्य विनिवृत्तं मे प्रभुत्वममराधिप |
४४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
तदद्य व्यपनेष्यामि परलोककृताद्भय़ात् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
सञ्जय़ उवाच
तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
तदद्य सर्वं परिकीर्तितं मय़ा; परीक्ष्य तत्त्वं परिगन्तुमर्हसि ||
९४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
तदद्य हीनपुण्योऽहमार्तस्वरनिनादितम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
विश्वावसुरु उवाच
तदनन्तरं च रुद्रस्य विश्वरूपस्य धीमतः ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
भीष्म उवाच
तदनन्तरमुक्तं यत्तन्निवोध युधिष्ठिर ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
तदनन्तरमेतच्च वाह्लिकानां वलं महत् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
तदनन्तरमेवासीन्नीलो नीलाय़ुधैः सह ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
तदनानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
तदनाश्वासिकं मोघं विनाशि चलमध्रुवम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तदनीकं तदा पार्थो व्यधमद्वहुभिः शरैः |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तदनीकं महत्तेषां विवभौ सागरस्वनम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तदनीकं महद्दृष्ट्वा गजाश्वरथसङ्कुलम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तदनीकं महावाहो भित्त्वा परमदुर्जय़म् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तदनीकं विभित्सन्तो महास्त्राणि व्यदर्शय़न् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
तदनीकमनाधृष्यं पालितं लोकसत्तमैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
तदनीकमनाधृष्यं भारद्वाजेन रक्षितम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तदनीकमनीकेन समरे वीक्ष्य पातितम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तदनीकमभिप्रेक्ष्य ततस्ते पाण्डुनन्दनाः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तदनीकमभिप्रेक्ष्य त्रय़ः सज्जा महारथाः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तदनुग्रहात्कुण्डले गृहीत्वा पुनरभ्यागतोऽसि |
१७६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तदनुजाने भवन्तम् |
९२ 5
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
तदनुज्ञातुमिच्छामि भवता मुनिसत्तम |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तदनुध्याहि भद्रं ते वधं तस्य दुरात्मनः ||
२० ग
विराट पर्व
अध्याय ४६
द्रोण उवाच
तदनुस्मृत्य गाङ्गेय़ यथावद्वक्तुमर्हसि ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तदनुस्मृत्य ते वीरा दर्शनं पौर्वकालिकम् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
तदनेन नरव्याघ्र मय़ा यत्तेन संय़ुगे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तदनेन प्रसङ्गेन फलेनैवेह युज्यते ||
१३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
तदनेनाभिषङ्गेण वय़मप्यर्जुनं शुभे |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
पितामह उवाच
तदनेनैव दोषेण क्षीणं येनासि पातितः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तदन्तं हि भवेद्वैरमनुमानेन माधव ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
तदन्तः सर्वभूतानां ध्रुवं तिष्ठन्न दृश्यते ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
तदन्तः सर्वभूतेषु ध्रुवं तिष्ठन्न दृश्यते ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
तदन्तकज्वलनसमानवर्चसं; पुनः पुनर्न्यपतत वेगवत्तदा |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तदन्तरं च सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो महारथः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
तदन्तरं समासाद्य पाण्डवो मां धनञ्जय़ः |
७९ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
तदन्तरमथावृत्य कोटिकाश्योऽभ्यहारय़त् |
५ क