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शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
न मूलघातः कर्तव्यो नैष धर्मः सनातनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
न मूलफलभोगेषु स्पृहामप्यकरोत्तदा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
न मृतो जय़ते शत्रूञ्जीवन्भद्राणि पश्यति |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
समङ्ग उवाच
न मृत्युतो न चाधर्मान्न लोभान्न कुतश्चन |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
न मृत्युमतिवर्तन्ते वेलामिव महोदधिः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
न मृत्युरतिगो भावः स मृत्युमधिगच्छति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
न मृत्युसेनामाय़ान्तीं जातु कश्चित्प्रवाधते |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
न मृत्योः समय़ं विद्म रात्रौ वा यदि वा दिवा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
न मृषा व्रवीमि |
१३० ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
न मृषाभिहितं राज्ञो मनुष्येषु प्रकाशय़ेत् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
न मृष्यति हतं नूनं भूरिश्रवसमाहवे ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
न मृष्याद्भृशसङ्क्रुद्धो मां दृष्ट्वैव सशोणितम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न मृष्यामि च राधेय़ं हतमाहवशोभिनम् |
१०८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
न मृष्यामि रणे भीष्मं प्रत्युद्यातं शिखण्डिनम् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
न मे कश्चिद्विजानीय़ान्मुखमद्येति भारत |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
विराट उवाच
न मे किञ्चित्त्वय़ा रक्ष्यमन्तरेणापि देवितुम् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
न मे कीर्तिः प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
न मे कोपस्त्वय़ा कार्यः शिरसा त्वां प्रसादय़े ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
न मे क्रुद्धस्य पर्याप्ताः सर्वे लोकाः शुचिस्मिते |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
न मे जितः कश्चन धारय़ेद्धनं; वरो ममैषोऽस्तु तव प्रसादतः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
न मे जय़ः प्रीतिकरो न राज्यं; न चामरत्वं न सुरैः सलोकता |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
अग्निरु उवाच
न मे तत्र गतिर्व्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते ||
२९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डितः समः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
न मे तुल्यावुभावेतौ वाहुवीर्ये कथञ्चन ||
२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
न मे त्वत्तः प्रिय़तरो लोकेऽस्मिन्पाण्डुनन्दन |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
न मे त्वत्तो भय़ं राजन्न च पार्थाद्वृकोदरात् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
न मे त्वदन्या सुभगे प्रिय़ा इत्यव्रवीस्तदा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
न मे त्वद्वचनात्किञ्चिदकर्तव्यं कथञ्चन ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
न मे त्वमपराद्धोऽसि न नृपो वभ्रुवाहनः |
५ ख
वन पर्व
अध्याय २८६
कर्ण उवाच
न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
गान्धार्यु उवाच
न मे दुःखं भवेदेतद्यदि त्वं धर्ममाचरः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
न मे दुःखतरं किञ्चिद्भूतपूर्वं ततोऽधिकम् |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
न मे देवमनुष्येषु गुणकेश्याः समो वरः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
न मे धनञ्जय़स्यार्थे प्राणा रक्ष्याः कथञ्चन |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विकृत उवाच
न मे धारय़ते किञ्चिद्विरूपोऽय़ं नराधिप |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
न मे धारय़सीत्येको धारय़ामीति चापरः |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
न मे निन्दाप्रशंसाभ्यां ह्रासवृद्धी भविष्यतः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
न मे नैतद्वहुमतं देवर्षे वचनं तव |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
न मे पापोऽस्त्यभिप्राय़ः पाण्डवान्प्रति केशव |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
न मे पिता प्रिय़तरो न त्वं तात तथा प्रिय़ः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
न मे पिता प्रिय़तरो व्राह्मणेभ्यस्तथाभवत् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
न मे पितुः पिता राजन्न चात्मा न च जीवितम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
न मे पितुः पिता वापि ये चान्येऽपि सुहृज्जनाः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ११५
भृगुरु उवाच
न मे पुत्रो भवेदीदृक्कामं पौत्रो भवेदिति ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
न मे प्रिय़ं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
न मे प्रिय़ं महावाहो यत्ते वुद्धिरिय़ं कृता |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
न मे प्रिय़ं महावाहो यद्गताः पाण्डवा वनम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
न मे प्रिय़ं महावाहो यन्मामभ्येति सात्यकिः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
न मे प्रिय़ं यत्स हतः सम्प्राहैवं पुरो वचः |
३५ क