वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्ततः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
ततो मुहूर्तादुत्थाय़ कृत्वा शौचमनन्तरम् |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादुपलभ्य चेतनां; प्रमृज्य वक्त्रं रुधिरार्द्रमात्मनः |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
ततो मुहूर्ताद्धरिपिङ्गलाक्षः; प्रवेष्टितो रोमभिरा नखाग्रात् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्ताद्भगवानैरावतशिरोगतः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्ताद्भगवान्पुरस्ताच्छशलक्षणः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्ताद्भगवान्सहस्रांशुर्दिवाकरः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्ताद्भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्ताद्राजेन्द्र नातिकृच्छ्राद्धसन्निव |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्ताद्राजेन्द्र पाण्डवः कर्णमाद्रवत् ||
३० ग
आदि पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
ततो मूर्धन्युपाघ्राय़ पर्यश्रुनय़ना नृप |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मृगव्यालगणानुकीर्णं; महावनं तद्विहगोपघुष्टम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मृगसहस्राणि हत्वा विपुलवाहनः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
ततो मे कश्मलस्यान्ते मतिः पुनरुपस्थिता ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मे त्रिगुणा यक्षा ये मद्वचनकारिणः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
ततो मे त्वच्चरौ भावः पादपे च सुमध्यमे |
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
ततो मे दुःखमुत्पन्नं दृष्ट्वा युष्मानधोमुखान् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
ततो मे पुनरेवासीत्सञ्ज्ञा सञ्चिन्त्य शास्त्रतः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मे पृथिवीपाल विस्मय़ः सुमहानभूत् |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
ततो मे भगवान्दृष्टो हरिर्नाराय़णः प्रभुः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
ततो मे विपुला वुद्धिस्त्वय़ि भीष्म समाहिता ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
ततो मे विस्मय़ो जातस्तद्दृष्ट्वा तपसो वलम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
ततो मे व्राह्मणास्तुष्टास्तस्मिन्कर्मणि साधिते |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
ततो मे सुकृतं कर्म कृतमात्मविशुद्धय़े |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मेघवरप्रख्यं स्यन्दनं वै सुकल्पितम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
ततो मेरुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मेरोः प्रचक्राम पर्वतं गन्धमादनम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
ततो मोक्षाय़ यतते नानुपाय़ादुपाय़तः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
ततो मोक्षे प्रय़तते नानुपाय़ादुपाय़तः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
ततो मोहं समापन्ने तनय़े मम भारत |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
ततो मोहपरीतास्ते नापश्यन्त यथा पुरा |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मोहसमापन्नं ज्ञात्वा पार्थं दिवौकसः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ततो म्लेच्छाः स्थितैर्मत्तैस्त्रय़ोदशशतैर्गजैः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ततो मय़ः स्वतपसा चक्रे धीमान्पुराणि ह |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
ततो मय़ैतच्छ्रुत्वा च कीर्तितं तव भारत ||
१११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
ततो मय़ैवमुक्ते तु वाक्ये धर्मभृतां वरः |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
ततो मय़ोक्तं तद्वाक्यं प्रहस्य द्विजसत्तमाः |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
ततो यज्ञः प्रताय़ेत सत्यस्यैवावधारणात् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
ततो यज्ञश्च यष्टा च पुराणः पुरुषो विराट् |
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यज्ञसमाप्तौ तान्विससर्ज महामुनीन् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यज्ञसमाप्त्यर्थं क्रिय़ाः सर्वाः समारभत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
ततो यज्ञाः प्रवर्तन्ते धर्माश्च विविधाः क्रिय़ाः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
ततो यज्ञाः प्रवर्तन्ते हव्यं कव्यं च सर्वशः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
११७
अकृतव्रण उवाच
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्यः प्रतापवान् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
ततो यज्ञो ववृधे तस्य राज्ञो; यत्र देवाः स्वय़मन्नानि जह्रुः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यज्ञोपवीतैस्ते तत्तीर्थं निर्मिमाय़ वै |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततो यतन्तमपरमभिवीक्ष्य सुतं तव |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
ततो यथागतं जग्मुर्मृत्युः कालोऽथ पन्नगः |
७३ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यथाप्रतिज्ञाभिः प्राविशन्नगरं महत् |
३१ क