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शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तथासौ वाक्प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तथास्तु कृष्णेत्यभिनन्द्य वाक्यं; धनञ्जय़ः प्राह धनुर्विनाम्य |
९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
तथास्तु साधय़िष्यामि तत्र यास्याम्यसंशय़म् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
तथास्त्राणि सुघोराणि विक्रमश्च महात्मनः ||
१६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तथास्त्रैर्मत्समो नास्ति कश्चिदेव धनुर्धरः ||
५५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तथास्त्विति च तेनोक्तः कौन्तेय़ेन यय़ौ वनम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तथास्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
तथास्त्विति ततो राजा कुरुः शक्रमुवाच ह ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
तथास्माकं वहवस्तत्र योधाः; कर्णं तदा याहि याहीत्यवोचन् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तथास्मान्वाधसे नित्यं धार्तराष्ट्रमते स्थितः ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय ९२
युधिष्ठिर उवाच
तथास्मि दुःखसन्तप्तो यथा नान्यो महीपतिः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
तथास्मिन्देवदेवेश त्रिरात्रमुषितः शुचिः |
४५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
तथास्य कर्मणः कर्तुरभिनिर्वर्तते फलम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तथास्य चित्तं ह्यपि संवितर्कय़; न्नरर्षभस्याद्य न यामि तत्त्वतः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
तथास्य चीरान्तरिता प्रभाति; हिरण्मय़ी मेखला मे यथेय़म् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तथास्य दृश्यते चेष्टा नीतिश्चैव विशां पते |
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
तथास्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
तथास्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तथास्य समरे राजन्वपुरासीत्सुदुर्दृशम् ||
१२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
तथास्यातिथय़ः पूज्या हव्यकव्यवहाः सदा ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तथाहं त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सामि सुहृत्तय़ा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
तथाहमपि जानामि नरनाराय़णावृषी ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
तथाहमपि तं पापं दग्धुमिच्छामि पन्नगम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
सर्प उवाच
तथाहमपि तस्मान्मे नैष हेतुर्मतस्तव ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
तथाहमपि ते रक्ष्यः सदैव द्विजसत्तम ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
तथाहमपि सम्प्राप्तो लूनपक्ष इव द्विजः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
तथाय़ं पततां क्षुद्रः परासुर्मृगजीवनः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
युधिष्ठिर उवाच
तथाय़ं व्राह्मणो वाच्यः परिग्राह्यश्च यत्नतः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
तथाय़ं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुज ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
तथाय़मात्मनात्मानं साधु युक्तः प्रपश्यति ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
तथाय़ुक्तं च तं दृष्ट्वा मुमुदे स मुनिस्तदा |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
तथाय़ुक्तं च तद्दृष्ट्वा जन्मवेश्म पितुस्तव |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तथाय़ुक्तेन च कृतां क्रिय़ां लोको न मन्यते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
तथाय़ुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमाः ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
ऐल उवाच
तथाय़ुक्तो दृश्यते मानवेषु; कामद्वेषाद्वध्यते मुच्यते च ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तथेतरांस्तव सुतांस्ताडय़ामास भारत |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
तथेतराञ्शरान्घोराञ्शरैः संनतपर्वभिः ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
तथेतराणि सैन्यानि न स्म चक्रुः पराक्रमम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तथेतराणि सैन्यानि सर्वाण्येव विशां पते |
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
तथेतरान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तथेतरान्महेष्वासान्द्वाभ्यां द्वाभ्यां धनञ्जय़ः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
तथेतरान्समासाद्य नरनागाश्वसादिनः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तथेतरे अभ्यधावन्राक्षसा युद्धदुर्मदाः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
तथेतरे नरव्याघ्राः पाण्डवानां महारथाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तथेतरे महेष्वासाः सुशर्मप्रमुखा नृपाः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
तथेतरे महेष्वासाः सौभद्रं युध्यपातय़न् ||
४२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
तथेतरे रणे यत्तास्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तथेतरेषु क्रुद्धेषु तावकानामपि क्षय़ः ||
३६ ख