द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं केवलं हत्वा युक्तामक्षौहिणीं ज्वलत् ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
तदिदं क्षत्रिय़स्यासीत्कर्म वै शृणु मे रुरो |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
इन्द्र उवाच
तदिदं गृह्यतां विद्वन्पुष्करं मुनिसत्तम |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
तदिदं जीवितं तेषां तव कल्मषनाशनम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं तव कार्यं तु दूरप्राप्तं विजानता |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तदिदं दुष्प्रणीतेन भय़ं मां समुपस्थितम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
सूत उवाच
तदिदं दैवमस्माकं भय़ं पन्नगसत्तमाः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तदिदं दैवविहितं मम सङ्ख्ये निवर्तनम् |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं द्यूतमारव्धं पुनरेव यथा पुरा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
तदिदं द्रौपदीहेतोरन्योन्यस्य प्रवासनम् |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
तदिदं धर्मराजेन यातितं नो जनार्दन |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं धर्मय़ुक्तं च हितं चैव कुलस्य नः |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तदिदं नः कृतं घोरं रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः |
११९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं नरकाय़ाद्य कृतं कर्म मय़ा ध्रुवम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
तदिदं नाप्रशान्ताय़ नादान्ताय़ातपस्विने |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
तदिदं निधनं प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
तदिदं निश्चितं वुद्ध्या पूर्वैरपि महात्मभिः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं निहते द्रोणे विषण्णमिव लक्ष्यते |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं पाण्डवेय़ानामन्तकाय़ाभिसंहितम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
तदिदं भाषितं वाक्यं तथा च न तथैव च |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं मम भद्रं ते शोकस्थानमरिन्दम |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वचः स्म ह ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तदिदं मय़ि ते दृष्टं प्रत्यक्षं मधुसूदन |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
तदिदं यच्चिकीर्षामि धर्म्यं परमसंमतम् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तदिदं वचनं तेषां निरुक्तं वै जनार्दन |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं वचनं साधोराचार्यस्य महात्मनः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
तदिदं वर्तते घोरमागतं वैशसं महत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
तदिदं वैरमुत्पन्नं सुखमास्स्व व्रजाम्यहम् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं व्यसनं घोरं त्वय़ा द्यूतमुखं कृतम् |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं व्यसनं प्राप्तं मय़ा भाग्यविपर्ययात् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
राम उवाच
तदिदं व्याकुलं सर्वं कृतं धर्मस्य पीडनात् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
तदिदं व्रह्म वार्ष्णेय़मितिहासं शृणुष्व मे ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं व्राह्मणस्यास्य दुःखमापतितं ध्रुवम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
तदिदं सत्यमेवाद्य मोक्षिताहं त्वय़ानघ ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
तदिदं सफलं कर्म त्वय़ा वै प्रतिगृह्यताम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं क्षत्तुर्हितकरं वचः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं तव वाक्यं नृपात्मजे |
५९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेऽद्य चतुष्टय़म् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं फलं तस्यानय़स्य ते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं यत्पाण्डूनवमन्यसे ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दिव्यदर्शिनः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दीर्घदर्शिनः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तदिदं समनुप्राप्तं व्यसनं त्वां महात्ययम् ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
तदिदं सम्यगारव्धं त्वय़ाद्य भरतर्षभ |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तदिदं ह्येकमेवासीद्द्विधा जातं ममाद्य वै |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तदिदानीं समुत्तिष्ठ युध्यस्वेह सुय़ोधन ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
तदिन्द्रः सुरभीवाक्यं निशम्य भृशविस्मितः |
१७ क