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आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
त एवं संनिवृत्तास्तु युद्धाद्युद्धविशारदाः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
त एवं समनुज्ञाताः शूरा विक्रान्तय़ोधिनः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
त एवमुक्ताः प्रत्यूचू राजानमरिमर्दनम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
त एवैनं सम्परिवार्य तस्थु; रूचुश्चैनं सान्त्वपूर्वं तदानीम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
दुर्योधन उवाच
तं कथं पाण्डवं युद्धे दहन्तमहितान्वहून् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
तं कथं व्राह्मणं व्रूय़ाः क्षत्रिय़ं वा धनञ्जय़ ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
धृतराष्ट्र उवाच
तं कथं सूतपुत्रं हि भीमोऽय़ुध्यत संय़ुगे ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तं कदाचित्तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
तं कदाचिददीनात्मा सखा शक्रस्य मानितः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णः पञ्चविंशत्या नाराचानां समार्दय़त् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णः प्रतिविव्याध शतेन नतपर्वणाम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णः शरजालेन छादय़ामास मारिष |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णः संय़ुगे राजन्प्रत्यवारय़दाशुगैः |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णपुत्रो विधमन्तमेकं; नराश्वमातङ्गरथप्रवेकान् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णश्छादय़ामास शरव्रातैरनेकशः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
तं कर्णो भ्रातरश्चास्य नामृष्यन्त महारथाः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तं काद्रवेय़मस्तौषं कुण्डलार्थाय़ तक्षकम् ||
१४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तं कार्तय़ुगधर्माणं निराशीःकर्मसञ्ज्ञितम् |
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
तं कार्मुकधरं दृष्ट्वा श्रमार्तं क्षुधितं तदा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तं कार्मुकमहावेगमस्त्रज्वलितपावकम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तं कार्ष्णिं समरान्मुक्तमास्थितं रथमुत्तमम् |
६९ क
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
तं कालं च मुहूर्तं च प्रतीक्षन्ती नृपात्मजा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तं कालं पलितो ज्ञात्वा विचचार सुनिर्भय़ः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
तं कालमवजानीहि यस्य सर्वमिदं वशे ||
५३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
तं कालमिव मन्यन्तो भीमसेनं महावलम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
तं काश्यपोऽव्रवीत्प्रीतो नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
तं किरन्ति महात्मानं वन्यैः पुष्पैः सुगन्धिभिः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
तं कुमारमृषिर्दृष्ट्वा कर्म चास्यातिमानुषम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तं कुरुष्व यथातथ्यं राजा भव महारथ ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
तं कुरूणां कुलकरं कामाभिहतचेतसम् ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
तं कृच्छ्रगतमद्य त्वं कस्मान्नाभ्यवपद्यसे ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तं कृच्छ्रामापदं प्राप्तं दृष्ट्वा परमधन्विनः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
तं कृतं विरथं वीरं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
तं कृतक्षणमासीनं पर्यपृच्छच्छचीपतिः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
तं कृताञ्जलय़ः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तं कृत्वा द्विरदं भूय़ः सहदेवोऽङ्गमभ्यगात् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तं कृपः शरवर्षेण छादय़ामास भारत ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तं कृपः शरवर्षेण महता समवाकिरत् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत वुद्धिमान् ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तं कृष्णः प्रत्युवाचेदं वहूक्त्वा गुणविस्तरम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
तं कोसलानामधिपः कर्णिनाताडय़द्धृदि |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तं कौरवाणामधिपो वलेन; भीष्मेण भूरिश्रवसा च सार्धम् |
१०६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
तं क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
तं क्रुद्धं राक्षसं युद्धे प्रतिक्रुद्धस्तु राक्षसः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तं क्रुद्धः प्रतिविव्याध प्रतिविन्ध्यः शितैः शरैः |
३० क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तं क्रोधं वर्जितं धीरैः कथमस्मद्विधश्चरेत् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तं क्षत्रिय़ा महाराज ददृशुर्घोरमाहवे |
१०१ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
तं क्षमस्वेति सिषिधुस्ततः स विरराम ह ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
तं क्षीणकोशं सामन्ताः समन्तात्पर्यपीडय़न् ||
१२ ख