वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
सान्त्वय़ामास कल्याणीं वाससोऽर्धेन संवृताम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
सान्त्वय़ामास कामार्तस्तदवुध्यत भामिनी ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
सान्त्वय़ामास कार्यं च प्रतिजज्ञे द्विजैः सह ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
सान्त्वय़ामास तानश्वांस्तेजोवलसमन्वितान् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ामास नारीश्च हतवीरा हतेश्वराः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
सान्त्वय़ामास भगवान्वधूं व्रह्मा पितामहः ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ामास भूय़श्च क्षमय़ामास चासकृत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ामास मानार्हान्मन्यमानो यथाविधि ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ामास वलवान्समय़े च न्यवेशय़त् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सान्त्वय़ामास वैदेहीं धर्मज्ञा प्रिय़वादिनी ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
सान्त्वय़ामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ित्वा च मित्राणि वलं चाभाष्यतां सुखम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ित्वा च राजेन्द्रो दत्त्वा च विविधं वसु |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
सान्त्वय़ित्वा तु तं पुत्रं निष्क्रम्यान्तःपुरान्नृपः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ेथा यथाकामं सान्त्व्यमाना रमेद्यदि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
सान्त्वय़ेन्न च भोगार्थमनुगृह्णन्न चाक्षिपेत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सान्त्वय़ोगमतिः प्राज्ञः कार्याकार्यविचारकः ||
१८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
सान्यानाश्रित्य जीवन्ती परित्यक्ष्यामि जीवितम् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
सापतद्दशधा छिन्ना भूमौ पार्थेन धीमता ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सापतद्दशधा राजन्निकृत्ता कर्णसाय़कैः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
सापतन्मेदिनीं दीप्ता भासय़न्ती महाप्रभा ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
सापत्नकमृते लोके भवितव्यं हि तत्तथा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सापत्यो निरपत्यो वा मुक्तश्चर यथासुखम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
सापत्रपश्च युक्तश्च सुनेय़ः श्रेय़से परैः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
सापश्यद्विवुधान्सर्वानस्वेदान्स्तव्धलोचनान् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
सापश्यमाना भर्तारं दुःखशोकसमन्विता |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
सापह्नवं पाण्डवेषु पाण्डवानां सुसंमतम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
सापह्नवाः सदैवासन्पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज |
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
सापि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
सापि गर्भान्समादत्ते मानुषीणां सदैव हि ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
सापि वाष्पकलां वाचं निगृह्याश्रूणि चैव ह |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
साप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
साभज्यताथ पृतना शैनेय़शरपीडिता |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
साभिगम्य वसिष्ठं तु इममर्थमचोदय़त् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
साभिगम्याव्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
साभिगम्याश्रमपदं रमणीय़ं शरद्वतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
साभिनिष्क्रम्य राजेन्द्र तादृग्रूपा भय़ावहा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
साभिमानमिदं वाक्यं दुर्योधनमथाव्रुवन् ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
साभिवाद्य तपोवृद्धान्विनय़ावनता स्थिता |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
साभिवाद्य पितुः पादौ व्रीडितेव मनस्विनी |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
साभिवाद्य पितुः पादौ शेषाः पूर्वं निवेद्य च |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
साभ्यगच्छत मां देवि रूपेणाप्रतिमा भुवि |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
साम आदौ प्रय़ुक्तं मे राजन्सौभ्रात्रमिच्छता |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
साम चोपप्रदानं च भेदो दण्डश्च पाण्डव |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
विष्णुरु उवाच
साम तस्य प्रय़ुञ्जध्वं तत एनं विजेष्यथ ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
साम दानं च भेदश्च दण्डश्च विधिवद्गुणाः ||
५१ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
साम वा पाण्डवेय़ेषु प्रय़ुङ्क्ष्व यदि मन्यसे ||
४५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सामगानां च निर्घोषो नराणां रुदतामपि ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सामन्तेभ्यः प्रिय़ाण्यस्य कार्याणि सुगुरूण्यपि |
१४ क