आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
अपि वर्षसहस्री त्वं वाल एव मतो मम |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
अपि वर्षसहस्रेण न चास्यान्तोऽधिगम्यते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अपि वा रथघोषेण भय़ार्ता सव्यसाचिनः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
अपि वा संशय़ं प्राप्य जीवितेऽपि पराक्रम ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अपि वा ह्येष पाण्डूनां योत्स्यतेऽर्थाय़ सञ्जय़ ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
अपि वाचं भाषमाणस्य काव्यां; धर्मारामामर्थवतीमहिंस्राम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अपि वाचं भाषमाणस्य काव्यां; धर्मारामामर्थवतीमहिंस्राम् |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
अपि वाणमय़ं तेजः प्रदीप्तमिव सर्वतः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
अपि वाप्सु निमज्जेत त्रिर्जपन्नघमर्षणम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
अपि विप्रेषु वः पूजा पूजार्हेषु न हीय़ते ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
अपि विश्वकृता तात कुतस्तु पुरुषैरिह ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
अपि विश्वजितं विष्णुं मातुलं प्राप्य सूतज |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१३
धृष्टद्युम्न उवाच
अपि वृत्रहणा युद्धे किं पुनर्धृतराष्ट्रजैः ||
११९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
अपि वृत्रहणा युद्धे रथय़ूथपय़ूथपः ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
अपि वृत्रहणा सङ्ख्ये रथय़ूथपय़ूथपः ||
१०९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
अपि वो निर्जितं राज्यं न हरेत सुय़ोधनः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
दुर्योधन उवाच
अपि शक्यो रणे जेतुं वज्रहस्तः पुरन्दरः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
अपि शूद्रं तु सद्वृत्तं धर्मज्ञमभिपूजय़ेत् ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
अपि शेषं भवेदद्य पुत्राणां मम सञ्जय़ ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
अपि श्वपाके शुनि वा न दानं विप्रणश्यति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
अपि सङ्क्षीणकोशोऽपि लभते परिवारणम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अपि सज्जो महातेजा भीष्मं द्रष्टुं युथिष्ठिरः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
अपि सञ्चय़वुद्धिर्हि लोभमोहवशङ्गतः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
शल्य उवाच
अपि सञ्जनय़ेय़ुर्ये भय़ं साक्षाच्छतक्रतोः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मना ||
१७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अपि सर्वां महीं लव्ध्वा क्षिप्रमेव विनश्यति ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
अपि सर्वामरैश्वर्यं त्यजेय़ुर्न पुनर्जय़म् |
६ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
अपि सर्वेश्वरत्वं हि न वाञ्छेरन्पराजिताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
अपि सर्वैर्गुणैर्युक्तं भर्तारं प्रिय़वादिनम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
अपि सा पूय़ते तेन न तु भर्ता प्रदुष्यते ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
अपि सा रथघोषेण भय़ार्ता सव्यसाचिनः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अपि सा सफला कृष्ण कृता ते भरतान्प्रति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
अपि सिन्धोर्गिरेर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
अपि स्यान्मेदिनी हीना सोमसूर्यप्रभांशुभिः |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
अपि स्वं समरे योधं धावमानं विचेतसः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
अपि स्वस्ति भवेत्तस्याः प्रिय़ाय़ा मम कानने |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
अपि स्वस्ति भवेदद्य धृष्टद्युम्नस्य गौतमात् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अपि स्वस्ति भवेद्राज्ञः सामात्यस्य गुरोर्मम ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
अपि ह्यस्मिन्परे गृद्धा भवेय़ुर्ये पुरोगमाः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
अपि ह्युक्तानि कर्माणि व्यवस्यन्त्युत्तरावरे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
अपि ह्युदाहरन्तीमा गाथा गीता यय़ातिना ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
अपि ह्येतद्दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
अपि ह्येतद्व्राह्मणेषु दृष्टं वृत्तिपरिक्षय़े ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
गान्धार्यु उवाच
अपिवः शोणितं सङ्ख्ये दुःशासनशरीरजम् ||
१२ ख