chevron_left  चोदय़ाश्वान्महावाहोarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्महावाहो यावद्धन्मि धनञ्जय़म् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्यतो भीष्मः करिष्ये वचनं तव |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्यतो भीष्मो विगाह्यैतद्वलार्णवम् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्हृषीकेश यत्र दुर्मर्षणः स्थितः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्हृषीकेश यत्रैते वहुला रथाः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
भीम उवाच
चोदय़ाश्वान्हृषीकेश विगाह्यैतं रथार्णवम् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्हृषीकेश संशप्तकगणान्प्रति |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
चोदय़िष्यामि धर्मज्ञ गमनार्थं तवानघ ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
चोरस्येव गृहीतस्य न प्रावर्तत भारती ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
चोराः प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सकाः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
चोराश्चान्येऽनृताश्चान्ये तथान्ये नटनर्तकाः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
चोरय़ित्वा तु दुर्वुद्धिर्मधु दंशः प्रजाय़ते ||
९६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
चोरय़ित्वा नरः पट्टं त्वाविकं वापि भारत |
१०१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
चोरय़ित्वा पय़श्चापि वलाका सम्प्रजाय़ते |
९६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
चौक्षश्चौक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
चौक्षाश्च भगवद्भक्ताः सूताः पौराणिकाश्च ये ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
चौराटव्यवलैश्चोग्रैः परराष्ट्रस्य पीडनम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
चौरिकानृतमाय़ाभिरधर्मश्चोपचीय़ते ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
चौरे कृतघ्ने विश्वासो न कार्यो न च नास्तिके ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
च्यवनं च सुकन्यां च दृष्ट्वा देवसुताविव |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं मनीषिणम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
च्यवनं भार्गवं व्रह्मन्पुलोमा दुःखमूर्च्छिता ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
च्यवनः कृतवांस्तौ चाप्यश्विनौ सोमपीथिनौ ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरञ्जय़म् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
शौनक उवाच
च्यवनत्वं परिख्यातं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
च्यवनश्च सुकन्याय़ां पुलस्त्यः सन्ध्यया यथा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
च्यवनस्तमनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमव्रवीत् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
च्यवनस्तु महातेजाः पुनरेव नराधिपम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
च्यवनस्य महाराज तद्वाक्यं प्रत्यपूजय़त् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
च्यवनस्यान्वय़े जातः ख्यातो वेदविदां वरः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
च्यवनस्यापि दाय़ादः प्रमतिर्नाम धार्मिकः |
७ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
च्यवनस्याश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजनिषेवितम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
च्यवनस्याश्रमश्चैव ख्यातः सर्वत्र पाण्डव |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
च्यवनस्याश्रमे चैव व्रह्मणः स्थान एव च ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
च्यवनेन ततो मन्त्रैरभिभूताः सुराभवन् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
देवा ऊचुः
च्यवनेन हृता भूमिः कपैश्चापि दिवं प्रभो ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
च्यवनो जमदग्निश्च वसिष्ठो गौतमो भृगुः |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
च्यवनो वज्रशीर्षश्च शुचिरौर्वस्तथैव च ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
च्यवनोऽपि सुकन्या च सुराविव विजह्रतुः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
च्यवन्तं जाय़मानं च गर्भस्थं चैव सर्वशः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
च्यवन्तं जाय़मानं च योनिं चानुप्रवेशितम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
च्यवमानान्यदृश्यन्त द्रुमेभ्य इव पक्षिणः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
च्यावय़ामास समरे केशवं चेदमव्रवीत् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
च्युतं तु गौतमं स्थानात्समीक्ष्य कुरुनन्दनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
युधिष्ठिर उवाच
च्युतः कोशाच्च दण्डाच्च सुखमिच्छन्कथं चरेत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
च्युतः स्वराज्याद्वनवासमाश्रितो; विनष्टचक्षुः श्वशुरो ममाश्रमे |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
च्युता देवमनुष्येभ्यो यथा प्रेतास्तथैव ते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २७९
द्युमत्सेन उवाच
च्युताः स्म राज्याद्वनवासमाश्रिता; श्चराम धर्मं निय़तास्तपस्विनः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
च्युतानामिव तालेभ्यः फलानां श्रूय़ते स्वनः ||
१८ ख