chevron_left  तद्वदात्मसमाधानंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्त्ववित् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तद्वदासीदभीसारो द्रोणं प्रार्थय़तो रणे ||
१४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वदेवास्य विक्रान्तं नाय़मन्यो धनञ्जय़ात् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
तद्वद्गोषु मनुष्येषु तद्वद्धस्तिमृगादिषु |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
तद्वद्देशा दिशश्चैव हीना गङ्गाजलैः शुभैः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
तद्वद्देहगतं विद्यादात्मानं देहवन्धनम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तद्वद्भगवता तेन शिखाप्रोक्तेन भिक्षुणा |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तद्वद्भूतानि भूतात्मा सृष्ट्वा संहरते पुनः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तद्वद्भूतिलय़े स्नात्वा कथं स्वर्गं गमिष्यति ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
तद्वद्भूतिलय़े स्नात्वा सपुत्रा वस्तुमिच्छसि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वद्भूतेषु भूतात्मा सूक्ष्मो ज्ञानात्मवानसौ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
तद्वद्भूतेष्वहङ्कारं विद्याद्भूतप्रवर्तकम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
तद्वद्योगवलं लव्ध्वा व्यूहते विषय़ान्वहून् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
तद्वधाय़ नरश्रेष्ठ स्मरैतद्वचनं मम |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वधाय़ प्रय़ुञ्जीथास्तदास्त्रमिदमाहवे ||
७७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तद्वध्यमानं पाण्डूनां वलं कर्णास्त्रतेजसा |
३० क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तद्वनं तस्य नादेन सम्प्रस्थितमिवाभवत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तद्वनं तापसा नित्यं शेषाश्च वनचारिणः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वनं नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वरः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तद्वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २४४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वनं भरतश्रेष्ठाः स्वर्गं सुकृतिनो यथा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वनं मनुजव्याघ्रः सभृत्यवलवाहनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वनं वलमेघेन शरधारेण संवृतम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
तद्वनं वृक्षसङ्कीर्णं लताविटपसङ्कुलम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
तद्वन्महान्ति भूतानि यवीय़ःसु विकुर्वते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वन्मूर्तिविय़ुक्तः सञ्शरीरी नोपलभ्यते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वन्मूर्तिषु मूर्तिष्ठं ज्ञेय़ं ज्ञानेन पश्यति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तद्वन्मोहाद्यतमानो रथस्थ; स्त्वं प्रार्थय़स्यर्जुनमद्य जेतुम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वभूव वलं राजन्कौरव्यस्य सहस्रशः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तद्वभौ रौद्रवीभत्सं वीभत्सोर्यानमाहवे |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तद्वर्म हेमविकृतं रराज निपतत्तदा |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
तद्वलं पाण्डुपुत्रस्य द्रोणपुत्रप्रतापितम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तद्वलं प्रद्रुतं दृष्ट्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तद्वलं भरतश्रेष्ठ क्षुव्धार्णवसमस्वनम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
तद्वलं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं तथा निशि |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तद्वलं भरतश्रेष्ठ सवाजिद्विपमानवम् |
९४ क
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वलं भीमसेनस्य भुजय़ोरसमं परैः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तद्वलं सुमहद्दीर्णं त्वदीय़ं प्रेक्ष्य वीर्यवान् |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वलाग्र्यं विराटस्य सम्प्रस्थितमशोभत |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तद्वलौघममित्राणामभीतः प्राविशद्रणे ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तद्वल्लिङ्गान्तरं प्राप्य शरीरी भ्राजते पुनः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १८
सूत उवाच
तद्वाक्यं नान्वपद्यन्त ताञ्शशाप भुजङ्गमान् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वाक्यं पार्थिवाः सर्वे हृदय़ैः समपूजय़न् |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वाक्यमाकर्ण्य तथा कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
तद्वाक्यमाददे राजन्यदुक्तं द्रुपदेन ह ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वाक्यसमकालं तु कृतं सर्वमवेदय़त् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वाक्यसमकालं तु वीभत्सुर्निशितैः शरैः |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद्विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी |
१२ क