द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तन्न जानामि वार्ष्णेय़ यदि जीवति वा न वा |
८१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकाशिभिः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
साध्या ऊचुः
तन्नः कार्यं पक्षिवर प्रशाधि; यत्कार्याणां मन्यसे श्रेष्ठमेकम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
तन्नः प्रत्यक्षमेवेदमुपलव्धमसंशय़म् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तन्नः सर्वं विफलं राजपुत्र; फलार्थिनां निचुल इवातिपुष्पः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तन्नश्छिन्धि महाप्राज्ञ त्वं हि वै प्राज्ञसंमतः |
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
तन्नष्टमुभय़ं कस्माद्धर्मज्ञस्य सतस्तव ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
तन्नाददीत सहसा पौराणां रक्षणाय़ वै ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
तन्नामृष्यत कौन्तेय़ः कर्णस्य स्मितमाहवे |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तन्नामृष्यन्त पुत्रास्ते शत्रोर्विजय़लक्षणम् ||
७८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तन्नारदवचः श्रुत्वा साव्रवीदृषिसंसदि |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
तन्निःश्रेय़स्तैजसं रूपमेत्य; परां शान्तिं प्राप्नुय़ुः प्रेत्य चेह ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तन्निकृत्तं धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तन्निधाय़ धनुर्नीडे द्रोणः क्षत्रिय़मर्दनः |
४३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तन्निमित्तं महावाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
व्राह्मण उवाच
तन्निमित्तं व्रतं मह्यं नैतद्भेत्तुमिहार्हथ ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तन्निर्याणे दुःखितः पौरवर्गो; गजाह्वय़ेऽतीव वभूव राजन् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
तन्निवध्नाति कौन्तेय़ कर्मसङ्गेन देहिनम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
तन्निवर्त महान्कालो गच्छतो विनतात्मज ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तन्निवोध महाराज यथा वृत्तमिदं पुरा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषय़िष्यति ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
तन्नूनमभिसञ्चिन्त्य दृष्ट्वा कर्णं च निर्जितम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
तन्नैष क्षत्रिय़ो राजन्विश्वामित्रो महातपाः |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तन्नो मनसि संरूढं करिष्यामस्तथा च तत् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
तन्नोऽस्तु स्वकृतैर्यज्ञैर्नान्यतो मृगय़ामहे ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तन्मतं धृतराष्ट्रस्य सोऽस्यात्मा विवृतान्तरः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तन्मनः कुरुते सख्यं रजसा सह सङ्गतम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
तन्मनो जङ्गमं नाम तस्मादसि गरीय़सी ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
तन्मन्निसृष्टं गृह्णीष्व भव सत्ये स्थिरोऽपि च ||
५९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण्यु उवाच
तन्मन्ये कारणतमं यत एषा प्रवर्तते ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तन्ममाचक्ष्व कार्त्स्न्येन यथा कर्णस्त्वय़ा हतः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
धृतराष्ट्र उवाच
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन कुशलो ह्यसि सञ्जय़ ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
करालजनक उवाच
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन प्रत्यक्षो ह्यसि सर्वथा ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन यथा वृत्तं स्म संय़ुगे ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
आस्तीक उवाच
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्तास्मि तत्तथा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
युधिष्ठिर उवाच
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वं धर्मभृतां वर ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
जनमेजय़ उवाच
तन्ममाचक्ष्व भगवन्परं कौतूहलं हि मे ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
तन्ममाचक्ष्व भगवन्पश्येय़ं तां सभां कथम् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
धृतराष्ट्र उवाच
तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
तन्ममैकमना भूत्वा शृणु देवासुरोपमम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तन्महद्दारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ||
२३४ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तन्महात्मा महाभागः केतुः सर्वधनुष्मताम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
तन्महाभारताख्यानं श्रुत्वैव प्रविलीय़ते ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
तन्महोत्सवसङ्काशं हृष्टपुष्टजनावृतम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
तन्महोत्सवसङ्काशमासीदाकाशमच्युत ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
तन्महोदधिवत्पूर्णं नगरं वै व्यरोचत |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तन्महोदधिसङ्काशं निरानन्दमनुत्सवम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
तन्मा किमभितप्यन्तं वाक्षरैरभिकृन्तसि |
२६ क