आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मे सहस्रसमितं कस्मान्नेहाजय़त्तपः ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मे सुविदितं सर्वं प्रत्यक्षमिव चागमत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम् |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
तन्मेऽनुजानातु भवान्सुराश्च; व्रह्मा भवो व्रह्मविदश्च सर्वे ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
तन्मेऽमृतरसप्रख्यं मनो ह्लादय़ते विभो ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
तन्मैत्रमिति विज्ञेय़ं धूमाच्च वसवः स्मृताः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तन्मय़ा त्वत्कृतेनैतदन्यथा व्यपनाशितम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मय़ा भीमसेनस्य प्रीतय़ाद्योपपादितम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तन्मय़ा सह गत्वाद्य राजानं कुरुवर्धनम् |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
तन्मय़ा साधु वापीदं यदि वासाधु वै कृतम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
तन्वता परमास्त्राणि शरान्सततमस्यता |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तनय़ास्तव कर्णश्च व्यथिताः प्राद्रवन्दिशः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तप आस्थाय़ धर्मेण द्विजातीन्भर भारत ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तप उग्रं समास्थाय़ निय़मे परमे स्थिताः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नय़ः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
तपः कुरुत वै तीव्रं मुच्यध्वं येन किल्विषात् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
तपः परं कृतय़ुगे त्रेताय़ां ज्ञानमुत्तमम् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तपः परं मन्यमानस्तपस्येव मनो दधे ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तपः परं समातस्थुर्गृणन्तो व्रह्म शाश्वतम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तपः परमकं प्राप्तं न तु लोकास्त्वय़ा जिताः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
तपः पवित्रं वेदस्य तपः स्वर्गस्य साधनम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
तपः पूर्वं समुत्पन्नं धर्मस्तस्मादनन्तरम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भीष्म उवाच
तपः प्रचक्षते यावत्तावल्लोका युधिष्ठिर |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तपः प्रति स चोवाच तस्मै सर्वं कुरूद्वह ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
तपः प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
तपः श्रुतं च योनिश्चाप्येतद्व्राह्मण्यकारणम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
तपः श्रुतं सर्वमहीनकीर्ते; अनागतं चोपगतं च सर्वम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
तपः श्रेष्ठं प्रजानां हि मूलमेतन्न संशय़ः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तपः समभिसन्धाय़ वनमेवान्वपद्यत ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीय़ते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
तपः सुचीर्णमिति च प्रोवाच वृषभध्वजः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
तपः सुमहदातिष्ठदरण्ये संशितव्रतः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तपः सुमहदास्थाय़ तोषय़ेशानमीश्वरम् |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
युधिष्ठिर उवाच
तपः स्यादेतदिह वै तपोऽन्यद्वापि किं भवेत् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
तपःपराय़णा नित्यं सिध्यन्ते तपसा सदा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
तपःपराय़णाः सर्वे सिध्यन्ति तपसा च ते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
तपःप्रणिहितात्मानं मन्ये त्वारण्यकाङ्क्षिणम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
तपःप्रधानाः सततं चरन्तः; शृङ्गं गिरेश्चिन्तय़ितुं न शेकुः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२७
यम उवाच
तपःशौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण उवाच
तपःश्रुतेऽभिमथ्नीतो ज्ञानाग्निर्जाय़ते ततः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
तपःश्रुतोपसम्पन्नाः सर्वकामैरुपस्थिताः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
अरुन्धत्यु उवाच
तपःसञ्चय़ एवेह विशिष्टो द्रव्यसञ्चय़ात् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
तपःसिद्धिसमाय़ोगात्स राजा भरतर्षभ |
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
तपःस्वाध्याय़चारित्रैरेवं हीनः प्रतिग्रही ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
तपःस्वाध्याय़शीला हि दृश्यन्ते धार्मिका जनाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
तपःस्वाध्याय़शीलोऽहं निवृत्तश्च प्रतिग्रहात् ||
७९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तपतां च वरिष्ठाय़ निषण्णस्तत्पराय़णः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
अर्जुन उवाच
तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वय़म् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
तपती योषितां श्रेष्ठा किमन्यत्रापवर्जनात् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणामकृतं वचः ||
२७ ख