अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तपोविद्याविशेषात्तु मानय़न्ति परस्परम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तपोविशेषैर्वहुभिर्योगं यो वेद चात्मनः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
तपोवीर्यवलोपेताद्वेदवेदाङ्गपारगात् |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तपोवृद्धिं ततः पृष्ट्वा गाङ्गेय़ं यदुकौरवाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
तपोवृद्धिमपृच्छच्च कुशलं चैनमव्ययम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तपोवृद्धेन महता सुहृदां भूतिमिच्छता |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
तपोऽतप्यं महाराज मासं मूलफलाशनः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
तपोऽतप्यत दुर्धर्षस्तात नित्यं वृषध्वजः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
तपोऽतप्यन्महत्तीव्रं सुदुश्चरमरिन्दम ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
युधिष्ठिर उवाच
तपोऽथ गुरुशुश्रूषा किं श्रेय़ः पुरुषं प्रति ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव गम्यते; वलं वलेनापि तथा मनस्विभिः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तपोऽस्ति तप्तं गुरवश्च तोषिता; मय़ा यदिष्टं सुहृदां तथा श्रुतम् |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
तपोय़ुक्तं शरीरं च त्वां दृष्ट्वा धारितं पुनः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
तपोय़ुक्तमथात्मानममन्यत च वीर्यवान् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
तपोय़ुक्ताय़ दान्ताय़ वन्द्याय़ परमर्षय़े ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तपोय़ोगसमाधिस्थैरुद्धृता ह्यापदः प्रजाः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
तप्तं सुरैर्यत्र तपः पुरस्ता; दिष्टं तथा पुण्यतमैर्नरेन्द्रैः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
तप्तकाञ्चनजालानि निपेतुरनिशं तदा ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
तप्तकाञ्चनवर्णं च विमानं लभते नरः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
तप्तकाञ्चनवर्णाभं विमानमधिरोहति ||
३६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
तप्तकाञ्चनवर्माणस्ताम्रध्वजरथस्रजः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तप्तचामीकराभेण किङ्किणीजालमालिना |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तप्तहेममय़ैः शुभ्रैर्वभूव भय़वर्धनी |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
तप्तैर्भाण्डैः काञ्चनैरभ्युपेता; ञ्शीघ्राञ्शीघ्रं सूतपुत्रानय़स्व ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
तप्त्वा वर्षसहस्राणि चत्वारि तप उत्तमम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
तप्यतां या गतिर्देव वैराजे सा गतिर्भवान् ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
तप्यति स्म तपो राजन्वल्मीकेन समावृतः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
तप्यते यत्र भगवांस्तपो नित्यमुमापतिः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
तप्यमानं तपो घोरं तं ददर्श पितामहः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
तप्यमानं तपो नित्यं क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रिय़म् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
तप्यमानः किल पुरा विश्वामित्रो महत्तपः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तप्यमानमसंय़ुक्तं न भवेदिति मे मतिः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
तप्यमानस्तपो घोरं मम कम्पय़ते मनः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तप्यमानाय़ सलिले व्रह्मण्याय़ाजिताय़ च |
५४ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
शकुनिरु उवाच
तप्यसे तां हरिष्यामि द्यूतेनाहूय़तां परः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
तप्येत यदि तत्कृत्वा चरेत्सोऽन्यत्ततस्तपः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
तप्येय़ुः प्रच्युताः पृथ्व्या यथा पूर्णां नदीं नराः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
तप्स्यसे वाहिनीं दृष्ट्वा पार्थवाणप्रपीडिताम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
तम एव तु पश्यामि शरीरं ते न लक्षय़े |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तम एवाभवत्सर्वं न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
तमः शूद्रे रजः क्षत्रे व्राह्मणे सत्त्वमुत्तमम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तमः श्वभ्रनिभं दृष्ट्वा वर्षवुद्वुदसंनिभम् |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
तमः सत्त्वं रजश्चैव पृथक्त्वं नानुशुश्रुम ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तमः सूर्यमिवोद्यन्तं कौन्तेय़ं दीप्ततेजसम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
तमःकान्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तमःकूर्मं रजोमीनं प्रज्ञय़ा सन्तरन्त्युत |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
तमःपरिगतं वेश्म यथा दीपेन दृश्यते |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
तमःसंवृतमप्यासीत्सर्वं जगदिदं तदा |
८ क