भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
नैव ते श्रद्दधुर्भीता वदतोरावय़ोर्वचः ||
४४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
नैव ते स्वर्गमिच्छन्ति न यजन्ति यशोधनैः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
नैव तेऽस्ति परो लोको नापरः पापकर्मणः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
नैव त्यागी न सन्तुष्टो नाशोको न निरामय़ः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम् ||
३८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
नैव त्वमपि गोविन्द शममिच्छति राजनि ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
सुदेष्णो उवाच
नैव त्वां जातु हिंस्यात्स इतः सम्प्रेषितां मय़ा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
नैव दस्युर्मनुष्याणां न देवानामिति श्रुतिः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
नैव दुर्योधनः क्षुद्र केनचित्त्वद्विधेन वै |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
नैव देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
नैव देवो न गन्धर्वो नासुरो न च राक्षसः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
नैव दैवं न गान्धर्वं नासुरोरगराक्षसम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
नैव द्वौ न त्रय़ः कार्या न मृष्येरन्परस्परम् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहा च यः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
नैव धर्मेण तद्राज्यं नार्जवेन न चौजसा |
३ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
नैव नः पार्थ भोगेषु न धने नोत जीविते |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
नैव नस्तादृशं युद्धं दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
नैव नस्तादृशं राजन्दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
नैव नस्तादृशो राजन्दृष्टपूर्वो न च श्रुतः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
नैव नाम तव प्रीतिर्नैव नाम कृतज्ञता |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
नैव नित्यं जय़स्तात नैव नित्यं पराजय़ः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
नैव निम्नं स्थलं वापि सोऽविन्दत विहङ्गहा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
नैव नोऽस्ति धनुस्तादृङ्न योद्धा न च सारथिः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
नैव पश्येन्न शृणुय़ादवाच्यं जातु कस्यचित् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
नैव पुत्रान्न च भ्रातॄन्न पितॄन्न च वान्धवान् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
नैव पुमान्पुमांश्चैव स लिङ्गीत्यभिधीय़ते ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
नैव प्रशममत्र त्वं मन्यसे सुकरं प्रभो |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
नैव प्राप्नोति व्राह्मण्यमभिध्यानात्कथञ्चन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
नैव प्रार्थय़से लाभं नालाभेष्वनुशोचसि |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
नैव प्रीतमना रामो वचनं प्राह संसदि ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
नैव भागोऽत्र भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिय़ा हीनानि पार्थिव ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
नैव भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथञ्चन |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
नैव भीष्मो न च द्रोणो नाप्यन्ये युधि तावकाः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
नैव भूतो न भविता कृष्णतुल्यगुणः पुमान् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
नैव भोगैश्च मे कार्यं मा विहन्यत गच्छत ||
१२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
नैव मन्त्रकृतं किञ्चिन्नैव माय़ां तथाविधाम् |
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
नैव मानुषवद्देवाः प्रवर्तन्ते कदाचन |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
नैव मे पतय़ः सन्ति न पुत्रा भ्रातरो न च |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
नैव मे पतय़ः सन्ति न पुत्रा मधुसूदन |
११२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
नैव मेऽस्ति धनं किञ्चिन्न धनेनान्वितः सुहृत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९६
मार्कण्डेय़ उवाच
नैव यज्ञः स्त्रिय़ः कश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
नैव राज्ञा दरः कार्यो जातु कस्याञ्चिदापदि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
नैव राज्यं न राजासीन्न दण्डो न च दाण्डिकः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ||
८३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
जनमेजय़ उवाच
नैव वाचा न मनसा न पुनर्जातु कर्मणा |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
अर्जुन उवाच
नैव वाचा व्यवसितं भीम विज्ञाय़ते सताम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१०
सुरभिरु उवाच
नैव शक्नोति तं भारमुद्वोढुं पश्य वासव ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
नैव शक्या गुणा वक्तुं पृथक्त्वेनेह सर्वशः |
१ क