chevron_left  तमःसंवृतमस्पर्शमतिगम्भीरदर्शनम्arrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तमःसंवृतमस्पर्शमतिगम्भीरदर्शनम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
तमःसत्त्वरजोय़ुक्तस्तासु तास्विह योनिषु |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तमकूजमिवाज्ञाय़ जनौघं सर्वशस्तदा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
तमक्षमदसंमत्तं सुहृदां न तु कश्चन |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
तमग्निं त्रिः परिक्रम्य प्रविवेश महीपते ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
तमग्निं वलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
तमग्निः प्रार्थय़ामास दिधक्षुर्वातसारथिः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
तमग्निममरश्रेष्ठः प्रदहन्तं ततस्ततः |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
तमग्निमिव दुर्धर्षमसिशक्तिशरेन्धनम् |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
तमग्निमिव वस्त्रेण कथं छादितवत्यसि |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७१
वसिष्ठ उवाच
तमग्निमुद्गिरन्वक्त्रात्पिवत्यापो महोदधौ ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तमग्रणीः सर्वधनुर्धराणा; मेकं चरन्तं समरेऽतिवेगम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमङ्गदो वालिसुतः श्रीमानुद्यम्य पादपम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमचिन्त्य प्रहारं स वलवान्वालिनः सुतः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तमजं कारणात्मानं जग्मतुः शरणं भवम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तमजित्वा तु कौन्तेय़ो न निवर्तेत्कथञ्चन ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तमजेय़ं राक्षसेन्द्रं सङ्ख्ये मघवता अपि |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
तमजेय़मनाधृष्यं विजेतुं जिष्णुमच्युतम् |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
तमञ्जनचय़प्रख्यं कर्णो दृष्ट्वा महीधरम् |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तमञ्जनचय़प्रख्यं द्रौणिर्दृष्ट्वा महीधरम् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तमतथ्यभय़े मग्नो जय़े सक्तो युधिष्ठिरः |
१०६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
तमतिक्रम्य सुप्तस्य निशि काकमपोथय़न् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
तमतिक्रान्तकर्माणमतिक्रान्तगुणक्षय़म् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानं ततस्ततः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानमसाम्प्रतम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
तमतीत्य महावेगं सर्वाम्भोनिधिमुत्तमम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तमतीत्य यथाय़ुक्तं राजमार्गं युधिष्ठिरः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
तमतीत्याथ गोकर्णमभ्यगच्छद्दशाननः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तमत्रिमव्रवीत्प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम् ||
१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तमत्वरन्तं पलितं पाशानां छेदने तदा |
८५ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
तमथाश्वासय़न्सर्वे व्राह्मणा भ्रातृभिः सह |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तमथोवाच दुर्धर्षमाचार्यं जय़तां वरम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमदृश्यं शरैः शूरौ माय़यान्तर्हितं तदा |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
तमदृश्यानि भूतानि रक्षांसि च समाद्रवन् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तमदृष्ट्वा रथोपस्थे निलीनं व्यथितेन्द्रिय़म् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
तमद्य कर्णं राधेय़ं हन्तास्मि मधुसूदन ||
१९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
तमद्य कर्णं हन्तास्मि मिषतां सर्वधन्विनाम् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तमद्य निशितैर्वाणैर्निहत्य भरतर्षभ |
१०८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
तमद्य पक्षव्यजनैरुपवीजन्ति पक्षिणः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तमद्य मूलं पापानां जय़ सौतिं धनञ्जय़ ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तमद्य यदि वै वीर न हनिष्यसि सूतजम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तमद्य विप्रविद्धाङ्गमुपासन्त्यशिवाः शिवाः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्ड; ममृष्यमाणो भवतानुशिष्टः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भय़ावहम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
तमधर्ममपाक्रष्टुमारव्धः सहितस्त्वय़ा |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संय़ुगे |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन सञ्जय़ |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तमध्यतिष्ठन्मलय़ेश्वरो महा; न्यथाद्रिशृङ्गं हरिरुन्नदंस्तथा ||
३५ ख