भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीच्छान्तनवोऽभिवीक्ष्य; निवोध राजन्भव वीतमन्युः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीज्जामदग्न्य उपेत्य मधुसूदनम् |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्कुन्तिभोजः प्रीतिय़ुक्तमिदं वचः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्केन पथोपनीतो; ममोदरे तिष्ठसि व्रूहि विप्र ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्ततः पार्थः पार्षतं पृतनापतिम् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्ततः पूरुः कनीय़ान्सत्यविक्रमः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तमव्रवीत्ततः स्थूणः प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्ततो जिष्णुर्महदाश्चर्यमुत्तमम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्ततो यन्ता कच्चित्क्षेमं नु पार्षत |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्ततो राजा प्रीय़माणः पुनः पुनः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्तदा कर्णः शृणु मे राजकुञ्जर |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्तदा कर्णो व्यर्थं व्याहृतवानसि |
९३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
तमव्रवीत्तदा शङ्खस्तीव्रकोपसमन्वितः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्त्वय़ाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीय़तां मम ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
तमव्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं व्रजन् |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
तमव्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम् |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
तमव्रवीत्पिता नास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
तमव्रवीत्पिता व्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्पुनः कृष्णो मा त्वमत्र विचारय़ |
११ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
तमव्रवीत्प्रहस्येन्द्रो निर्वृत्तः स स्वय़ंवरः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्प्रीतमनाः कौन्तेय़ः प्रहसन्निव ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
तमव्रवीत्सत्यधृतिं तप्यमानं पितामहः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्सत्यधृतिः प्रणतं त्वग्रतः स्थितम् |
८४ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
तमव्रवीत्सत्यधृतिः सत्यवागृषिसत्तमः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
तमव्रवीत्समागत्य स राजा व्रह्मवित्तमम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीत्स्वागतमित्यनन्तरं; राजा प्रहृष्टः प्रतिसङ्गृहाण च ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीदश्रुपूर्णः कृष्णसर्प इव श्वसन् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
तमव्रवीदुग्रधन्वा प्रहस्य; नैवंशीलाः शेषमिहाप्नुवन्ति |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तमव्रवीदृषिस्तत्र वचः क्रुद्धो महातपाः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तमव्रवीदोघवती यता मूर्ध्नि कृताञ्जलिः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
तमव्रवीद्गुरुः सोऽथ पच्यमानोऽग्निना भृशम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमव्रवीद्दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय़ |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
तमव्रवीद्देवगुरुरपो विश महाद्युते |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
तमव्रवीद्देवराजो ममेदं; त्वं विद्धि विश्वं भुवनं वशे स्थितम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्धर्मराजः प्रहस्य; विराटमार्तं कुरुभिः प्रतप्तम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्धर्मराजो ह्रिय़माणो युधिष्ठिरः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्धूमकेतुः प्रतिपूज्य जलेश्वरम् |
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
तमव्रवीद्भगवानुग्रतेजा; मैवं पुनः शक्र कृथाः कथञ्चित् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्राजपुत्री समुपेत्य नरर्षभम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तमव्रवीद्रामवचः सौमित्रिरकुतोभय़ः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
तमव्रवीद्वामदेवस्तपस्वी जपतां वरः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीद्वासुदेवः किमिदं पाण्डुनन्दन |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्वासुदेवः प्रहस्य; गूढोऽप्यग्निर्ज्ञाय़त एव राजन् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीद्वासुदेवो यत्तो भव धनञ्जय़ |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीद्विद्धि कृतागसं मे; कृष्णाद्य मातुर्वधजातवैरम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
तमव्रवीन्नरो राजञ्शरण्यः शरणैषिणाम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीन्निर्मलतोय़दाभो; हलाय़ुधोऽनन्तरजं प्रतीतः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
तमव्रवीन्नृपः सूतं नाय़ं कालो विलम्वितुम् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्मद्रराजो महात्मा; वैकर्तनं प्रेक्ष्य हि संहितेषुम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् |
३१ क