वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीन्महाप्राज्ञं धृतराष्ट्रः प्रतापवान् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्महाराज धृष्टद्युम्नो वृकोदरम् |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्महाराज पुत्रस्तव विशां पते |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्महाराज भीष्मः शान्तनवः पुनः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्महाराज वासुदेवो जनाधिपम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्महाराज सूतपुत्रो नराधिपम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीन्महाराजो धार्तराष्ट्रो महाय़शाः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीन्महावाहुः कौरव्यः शिनिपुङ्गवम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवील्लोकगुरुररुणाय़ां यथाविधि |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
तमव्रुवन्देवगणा यं भवान्संनिय़ोक्ष्यते |
९५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
तमव्रुवन्पुनः सर्वे देवाः सर्षिपुरोगमाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
तमव्रुवन्प्रजा मा भैः कर्मणैनो गमिष्यति |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रूतां कुरुष्वेति स तथेत्यव्रवीच्च तौ ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
तमव्रूतां महात्मानौ भोजशारद्वतावुभौ |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तमशुश्रूषमाणं तु विलिखन्तं वसुन्धराम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
तमश्च कष्टं सुमहद्रजश्च; सत्त्वं च शुद्धं प्रकृतिं परां च |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तमश्च घोरं शव्दश्च तदा समभवन्महान् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तमश्चाष्टगुणं ज्ञात्वा वुद्धिं सप्तगुणां तथा ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तमश्रुपरिपूर्णाक्षं वेपमानमचेतसम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
तमश्रौषमहं गत्वा यथा वृत्तः सुदुर्मतिः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार ह ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तमश्विनावाहतुः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
तमसः पूर्वजो जज्ञे मधुर्नाम महासुरः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
तमसश्च तथा सत्त्वं सत्त्वस्याव्यक्तमेव च ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
तमसश्च प्रकाशोऽभूत्तनय़ो द्विजसत्तमः |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभय़म् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तमसह्यं केशवं तत्र मत्वा; सुग्रीवय़ुक्तेन रथेन कृष्णम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तमसह्यं विष्णुमनन्तवीर्य; माशंसते धार्तराष्ट्रो वलेन |
८२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
तमसा च महाराज रजसा च विशेषतः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
तमसा चावकीर्यन्त सूर्यश्च कलुषोऽभवत् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
तमसा चावृते लोके न प्राज्ञाय़त किञ्चन |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
तमसा चावृते लोके मृत्युनाभ्यर्दिताः प्रजाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
तमसा चावृते सैन्ये रजसा वहुलेन च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
तमसा तामसान्भावान्विविधान्प्रतिपद्यते |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तमसा त्वभ्यवस्तीर्णो मोह आविशतीव माम् |
१५९ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
तमसा निद्रय़ा चैव पुनरेव व्यदीर्यत ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
तमसा मूर्छितं याति येन नार्छति दर्शनम् ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तमसा रजनी घोरा वभौ दारुणदर्शना ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्त्वे व्यवस्थितः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तमसा रजसा चैव समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवेः करैः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
तमसा लोकमावृत्य नौगतामेव भारत ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
तमसा लोभय़ुक्तानि क्रोधजानि च सेवते |
३२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वथ मर्मसु |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
तमसा संवृते लोके न प्राज्ञाय़त किञ्चन |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
तमसा संवृते लोके नादृश्यत महाहवे ||
३० ख