chevron_left  तमैरावतमूर्धस्थंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
तमैरावतमूर्धस्थं प्रेक्ष्य देवगणैर्वृतम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
तमैलविलमासाद्य धर्मराजो व्यराजत ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
तमो घ्नतः सुदीप्तस्य सवितुर्मण्डलं यथा ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
पुत्र उवाच
तमो न व्यपहन्येत सुचित्रार्थपदाक्षरम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
तमो निहत्याभ्युदितौ यथामलौ; शशाङ्कसूर्याविव रश्मिमालिनौ ||
६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रः क्रोधसञ्ज्ञितः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावांस्तदाश्रय़ान् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावान्मदाश्रय़ान् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
तमो रजस्तथा सत्त्वं गुणानेतान्प्रचक्षते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
तमो ह्यष्टविधं हित्वा जहौ पञ्चविधं रजः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
तमोगताय़ामपि च निशाय़ां विचरिष्यथ ||
३१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
तमोगुणा वो वहुधा प्रकीर्तिता; यथावदुक्तं च तमः परावरम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तमोगुणेन संय़ुक्तौ भवतोऽव्यावहारिकौ ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति नराधिप ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
तमोग्रस्ता न पश्यन्ति प्रकाशं तमसावृतम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
तमोत्तरं यावदिदं न वर्तते; तावद्व्रजामि परलोकं चिराय़ ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
तमोनिचय़पङ्कं च रजोवेगप्रवर्तकम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
तमोनुदं मेघ इवातिमात्रो; धनञ्जय़ं छादय़िष्यामि वाणैः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
तमोरजोभ्यां निर्मुक्तः सत्त्वमास्थाय़ केवलम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः प्रवेक्ष्यन्ति च मां मुने ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
तमोरजोभ्यां सञ्छन्नांस्तान्किरीटी न्यवारय़त् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
तमोरजोभ्यामाविष्टा नानुपश्यन्ति मूर्तिषु ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तमोरजोविनिर्मुक्ता मां प्रवेक्ष्यन्त्यसंशय़म् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तमोवृतमभूत्सर्वं न प्रज्ञाय़त किञ्चन ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
तमोऽप्रकाशो भूतानां नरकोऽय़ं प्रदृश्यते |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
तमोऽव्यक्तं शिवं नित्यमजं योनिः सनातनः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तमय़स्मय़वर्माणं द्रौणिर्भीमात्मजात्मजम् |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तमय़स्मय़वर्माणमिषुणा आशुपातिना |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
तरत्येव महादुर्गं जरामरणसागरम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
तरन्ति चैव पाप्मानं धेनुं ये ददति प्रभो ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्म पापानि कुर्वते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
तरन्ति मुनय़ः सिद्धा ज्ञानय़ोगेन भारत |
६९ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तरन्तुकारन्तुकय़ोर्यदन्तरं; रामह्रदानां च मचक्रुकस्य |
१७८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
तरन्तुकारन्तुकय़ोर्यदन्तरं; रामह्रदानां च मचक्रुकस्य |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
तरन्निव जले श्रान्तो यथा स्थलमुपेय़िवान् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
तरसा पादपान्भञ्जन्महीं पद्भ्यां विदारय़न् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
तरसा प्रतिजग्राह हनूमान्पवनात्मजः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तरसा प्रेषय़ामास माधवस्य रथं प्रति ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
तरसा भागमन्विच्छन्धनुरादौ ससर्ज ह ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
तरसा ये न शक्यन्ते शस्त्रैः सुनिशितैरपि |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तरसा वुद्धिपूर्वं वा निग्राह्या एव शत्रवः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तरसा व्यजय़द्धीमाञ्श्रेणिमन्तं च पार्थिवम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तरसा सोऽभिदुद्राव मणिमन्तं महावलम् ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
तरसाभ्यागतौ दृष्ट्वा विमुक्तौ केशवार्जुनौ ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
तरसैवाजय़द्भीमो नातितीव्रेण कर्मणा ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तरसैवाभिपत्याथ यो वै द्रोणमुपाद्रवत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
तरस्ताली करस्ताली ऊर्ध्वसंहननो वहः |
१२७ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वे युद्धविशारदाः |
२५ क