आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
तस्यैतत्कर्म सुमहच्छ्रूय़तां भृगुनन्दन ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यैतत्तपसः कर्म येन ते ह्यनय़ो महान् |
१९ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
तस्यैतत्फलमद्यैषा भुङ्क्ते पुरुषसत्तम ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तस्यैतद्देवय़जनं स्थानमादित्यवर्चसः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
तस्यैतद्द्विजसङ्घुष्टं सरो राजन्प्रकाशते |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
तस्यैतद्वदनं कृष्ण श्वापदैरर्धभक्षितम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
तस्यैता घृतवाहिन्यः क्षरन्ते वत्सला इव ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
तस्यैतानि च कर्माणि तथान्यानि च कौरव |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
तस्यैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
तस्यैव च प्रसादेन प्रादुर्भूतं महामुने |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
तस्यैव च प्रसादेन भक्तिरुत्पद्यते नृणाम् |
१६० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तस्यैव च समीपे स यज्ञवाटो वभूव ह |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
तस्यैव चाम्रवृक्षस्य छाय़ाय़ां समुपाविशत् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
तस्यैव तपसा जातं नरं नाम महामुनिम् |
८० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तस्यैव तु दिनस्यान्ते हार्दिक्यद्रौणिगौतमाः |
२८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तस्यैव तु मनुष्यस्य सा सा वुद्धिस्तदा तदा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तस्यैव देहोरुसरःप्ररूढं; रराज नाराय़णवाहुनालम् ||
९० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तस्यैव नः श्रुतो यादृङ्निवातकवचैः सह ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्यते; न चैव शैलस्य हि दृश्यते व्रणः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्ये; न्न चापि किञ्चित्स गिरेस्तु कुर्यात् ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तस्यैव पुत्रप्रवरो मन्दरो नाम विश्रुतः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यैव मूर्धन्युशनाः काव्यो दैत्यैर्महीपते |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
तस्यैव वचनाद्राजन्निवृत्ताः श्वेतवाहनात् ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
तस्यैव वरदानेन धर्मस्य मनुजाधिप |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
तस्यैव संनिधौ दीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान्पश्यति यत्र वै ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान्पश्यति यत्र वै ||
४४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
तस्यैवं खिद्यमानस्य धर्मं परममास्थितः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
तस्यैवं गततृष्णस्य विज्वरस्य निराशिषः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तस्यैवं युध्यमानस्य सङ्ग्रामे संय़तात्मनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यैवं वदतोऽस्माभिर्हतो भ्राता निवेदितः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानतः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्याप्रमादिनः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यैवं वर्तमानस्य सौवलेन जिहीर्षता |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
राजपुत्र उवाच
तस्यैवं ह्रिय़माणस्य स्रोतसेव तपोधन |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
तस्यैवानुग्रहाद्राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
तस्यैवान्नं न भोक्तव्यमिति धर्मविदो विदुः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तस्यैवोर्ध्वं तिर्यगधश्चरन्ति; गभस्तय़ो मेदिनीं तापय़न्तः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यैष कामो दुहिता ममेय़ं; स्नुषा यदि स्यादिति कौरवस्य ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
तस्यैष भगिनीं काले जरत्कारुं प्रय़च्छतु ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
तस्यैष मन्युप्रभवो धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
तस्यैषा निष्कृतिः कृत्स्ना भूतानां भावनं पुनः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तस्योत्तमाङ्गं निपपात भूमौ; निनादय़द्गां निनदेन खं च ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तस्योत्तरं प्रतिवचो दूत एव वदिष्यति ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
५१
सूत उवाच
तस्योत्तरीय़े निहितः स नागो; भय़ोद्विग्नः शर्म नैवाभ्यगच्छत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च |
१०७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
तस्योत्सङ्गे निपतितं शिरस्तच्चारुकुण्डलम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्योदरे मय़ा दृष्टाः सर्वरत्नविभूषिताः ||
१०५ ख