chevron_left  तर्पय़िष्यामिarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
तर्पय़िष्यामि तानेव जलेन यमुनामनु ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
तर्षच्छेदो न भवति पुरुषस्येह कल्मषात् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तलं तलेन संहत्य सन्दश्य दशनच्छदम् |
१०१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
तलं तलेन संहत्य सन्दश्य दशनच्छदम् |
८७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तलत्राभिहताश्चैव ज्याशव्दा भरतर्षभ |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तलत्रैरङ्गुलित्रैश्च ध्वजैश्च विनिपातितैः |
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तलप्रहारैरन्यांश्च व्यहनत्पाण्डवो वली ||
४७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
तलवद्दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तलशव्दं च सुमहत्कृत्वा भीमो महावलः |
१०५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तलशव्दं महत्कृत्वा द्रोणस्तं समुपाद्रवत् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तलशव्दरवैश्चैव त्रासय़न्तौ परस्परम् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तलशव्देन रुषितौ यथा नागौ महाहवे ||
९० ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
तलाभ्यां तु स भीमेन वक्षस्यभिहतो वली |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
तलेन नाशय़ामास कर्णस्यैवाग्रतः स्थितम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
तल्पे चान्यस्य चौर्ये च पृथक्संवत्सरं चरेत् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुभे योधरक्षितम् ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
तल्लक्षय़ित्वा द्रुपदस्य पुत्रो; राजा च सर्वैः सह मन्त्रिमुख्यैः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तल्लोहित्यं समासाद्य विन्द्याद्वहु सुवर्णकम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तलय़ोश्च तथा शव्दान्धनुषोश्च महाहवे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तव कर्माण्यमोघानि व्रतचर्या च भामिनि |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
तव कल्याणि यत्कार्यं तत्करिष्ये सुमध्यमे ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
तव कार्योपरोधस्तु तस्माद्गच्छाव माचिरम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तव कृष्ण प्रभावेण गाण्डीवेन धनञ्जय़ः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तव कृष्ण प्रसादेन नय़ेन च वलेन च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
तव कोपाग्निना दग्धः पापो राजा जय़द्रथः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
तव क्रोधहतः पूर्वं देवैरपि सुदुर्जय़ः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
तव क्रोधहता ह्येते कौरवाः शत्रुसूदन ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ||
४४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तव गन्धानुगस्तात येनास्मान्सुखमागमत् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
तव गुर्वर्थकालोऽय़मुपपन्नः परन्तप |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
तव गेहे सुविहितः सदा सुप्रतिपूजितः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तव च प्रिय़कामेन आश्रमस्था दुरात्मना |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तव च भ्रातरं वीरमपश्यं सव्यसाचिनम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तव च भ्रातरः शूरा दुःशासनपुरोगमाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तव चाधिरथिर्दृष्ट्वा स्यन्दनेभ्यश्च्युतान्सुतान् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
तव चापि पिता तात परित्यक्तो मय़ानघ |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
अर्जुन उवाच
तव चापि प्रिय़ं कर्तुमिच्छामि जलचारिणि |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
तव चापि मय़ा कृष्ण स्वप्नान्ते रुधिराविला |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
तव चाप्यरतिस्तीव्रा वर्धते तमपश्यतः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते शुभे |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तव चैव परेषां च गतास्त्रा विगतेषवः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
तव चैव प्रभावेन स्वर्गं यास्यन्ति सागराः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
तव चैव प्रसादेन त्रिदशास्त्रिदशेश्वर |
१० क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गतिः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
तव चैव प्रिय़ं कार्यं श्रेय़श्चैतत्परं मम ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
तव चैव समक्षं वै भीमसेन महावल ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तव चैव हितं राजन्पाण्डवानामथो हितम् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
तव चैवं व्रुवाणस्य तथेत्येवाहमव्रुवम् ||
२४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तव चैवास्य शत्रोश्च तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
तव जातान्यपत्यानि सज्जनाचरिते पथि ||
२३ ख