शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चास्य कर्म पूज्यं हि प्रशस्यं च विशां पते |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तच्चास्य न भवेत्कार्यं चिन्तय़ा च विनश्यति ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
तच्चाहं चिन्तितं ज्ञात्वा गतवांस्तस्य दर्शनम् ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
तच्चिन्तय़ध्वं कुरुपाण्डवानां; धर्म्यं च युक्तं च यशस्करं च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
तच्चेत्सिध्येत्प्रय़त्नेन कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
तच्चेदफलमस्माकं नापराधोऽस्ति नः क्वचित् |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तच्चेदेवं देशरूपेण पार्थाः; करिष्यध्वं कर्म पापं चिराय़ |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चेद्दद्यादसङ्गेन सत्कृत्यानवमन्य च |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चैनां नाजहात्तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तच्चैव सर्वमाचक्षं यन्मां दुर्योधनोऽव्रवीत् |
५७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चैवाहं करिष्यामि अद्यैव द्विजसत्तम ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तच्छक्तिसङ्घाकुलचण्डवातं; महारथाभ्रं रथवाजिघोषम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तच्छङ्खशव्दावृतमन्तरिक्ष; मुद्धूतभौमद्रुतरेणुजालम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तच्छतान्यपि भुञ्जन्ति व्राह्मणानां मनीषिणाम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छरैरर्जुनो वर्षं प्रतिजघ्नेऽत्यमर्षणः ||
४४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
तच्छापदानाद्धिरण्यकशिपुः प्राप्तवान्वधम् ||
२० क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छालतालाम्रमधूकनीप; कदम्वसर्जार्जुनकर्णिकारैः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तच्छास्त्रममितप्रज्ञो योगाचार्यो महातपाः ||
९१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तच्छिन्नं सहसा तस्य शिरः कुञ्चितमूर्धजम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
तच्छिरः प्रापतद्भूमौ श्येनाहृतमिवामिषम् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छिरश्चरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले तदा ||
१७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वय़ात् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तच्छिरो न्यपतद्भूमौ कुण्डलोत्पीडितं महत् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
तच्छिरो न्यपतद्भूमौ तपनीय़विभूषितम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
तच्छिरो न्यपतद्भूमौ सन्दष्टौष्ठपुटं रणे |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तच्छिरो न्यपतद्भूमौ सुमहच्चित्रवर्मणः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
तच्छिरो रुधिराभ्यक्तं गृह्य केशेषु राक्षसः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ते मनुष्या लोकवासिनः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
तच्छुक्रं ज्योतिषां मध्येऽतप्तं तपति तापनम् |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तच्छुनामिव गोपादे पण्डितैरुपलक्षितम् ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छुभा शुभमासाद्य सौगन्धिकमनुत्तमम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षय़ज्ञं सविस्तरम् |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तच्छूलं सात्वतो ह्याजौ निर्भिद्य निशितैः शरैः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तच्छूलमतितीक्ष्णाग्रं सुभीमं लोमहर्षणम् |
१३५ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
तच्छूलमन्तरा रामश्चिच्छेद निशितैः शरैः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
तच्छूलवर्षं सुमहद्गदाशक्तिसमाकुलम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छृणुध्वं यथाज्ञानं वक्ष्ये संशय़मुत्तमम् |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तच्छृणुष्व महाराज पार्थो यदकरोन्मृधे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
तच्छैलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत् |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छोकजं दुःखमपारय़न्ती; कथं भविष्यत्युचिता सुखानाम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तच्छोकय़ुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छोणितं प्रत्यगृह्णाद्यत्प्रसुस्राव पाण्डवात् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तच्छोणिताभं निपतद्विरेजे; दिवाकरोऽस्तादिव पश्चिमां दिशम् ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा करुणं वाक्यं पुत्रपौत्रवधार्दितः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा कुरुवृद्धः स वलात्संवृत्तलोचनः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा केशवस्याङ्कमगमद्रुदती तदा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा कौरवेय़ास्ते तूष्णीमासन्विशां पते |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा क्रोधताम्राक्षः सात्यकिस्त्वाददे गदाम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
तच्छ्रुत्वा चाव्रुवन्देवाः सहस्राक्षमिदं वचः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यामुवाच क्रिय़तामिति |
१४ क