उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
निवेदय़ामास तदा माहात्म्यं जन्म कर्म च ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
निवेदय़ामास तदा विपुलः शक्रकर्म तत् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
निवेदय़ामास तदा शिवाय़ामिततेजसे |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
निवेदय़ामास तदा स्वं योगं परमर्षय़े ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामासतुरार्तवत्तदा; ततो राजा वाक्यमिदं वभाषे ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामो वार्ष्णेय़ सरत्नांस्ते गृहान्वय़म् ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
निवेदय़ावः कौन्तेय़ धर्मराजाय़ धीमते ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
निवेदय़िष्ये तामद्य प्राणदाय़ा महात्मने ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
निवेदय़े चापि प्रिय़ं भवत्सु; क्रतुर्महानल्पधनप्रचारः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
निवेदय़ेत्प्रय़त्नेन तिष्ठेत्प्रह्वश्च सर्वदा ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेशं कारय़ामास कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
निवेशनं च कुप्यं च क्षेत्रं भार्या सुहृज्जनः |
८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
निवेशनं हतोत्साहं पुत्राणां मम लक्षय़े ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेशनमथाजग्मुर्जरासन्धस्य धीमतः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
निवेशनानां क्षेत्राणां वसतीनां च भारत |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
निवेशने सत्यधृतेः सोमदत्तस्य सञ्जय़ |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
निवेशमकरोत्तत्र सुग्रीवानुमते तदा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत्कुरुसत्तमः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
निवेशार्थ्यखिलां भूमिं कन्याभैक्षं चरामि भोः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेशाय़ यय़ौ वेश्म विदुरस्य महात्मनः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
निवेशाय़ाभ्युपागच्छन्साय़ाह्ने रुधिरोक्षिताः ||
५९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
निवेशाय़ाभ्युपाय़ाम साय़ाह्ने रुधिरोक्षिताः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
निवेश्य भरतश्रेष्ठ निय़मस्थोऽभवत्सुखम् ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
निवेश्यं तु भवेत्तेन सदा तारय़िता पितॄन् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
निवेश्योपवने सैन्यं तच्छूरः प्राज्ञवानरम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेशय़ामास तदा सेनां राजा युधिष्ठिरः ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
भीष्म उवाच
निवेष्टुकामस्तु पुरा अष्टावक्रो महातपाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
निवोध च यथातिष्ठन्धर्मान्न च्यवते नृपः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
निवोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
निवोध दशहोतॄणां विधानं पार्थ यादृशम् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
निवोध दशहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
निवोधत महाभागा गुणवृत्तं च सर्वशः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
निवोधत महाभागा निखिलेन परं पदम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
निवोधत महाभागाः शिवं चाशास्त मेऽनघाः ||
१७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
निवोधत यथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
निवोधत यथावृत्तमुच्यमानं मय़ानघाः ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
निवोधैनं सुदुर्वुद्धिं मातुलं कलहप्रिय़म् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वैशम्पाय़न उवाच
निशठश्चारुदेष्णश्च पृथुर्विपृथुरेव च ||
१० ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
निशठाक्रूरसाम्वाश्च भानुः कम्पो विडूरथः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
निशठेनाथ साम्वेन तथैव कृतवर्मणा ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
निशम्य कर्णं कुरवः प्रदुद्रुवु; र्हतर्षभा गाव इवाकुलाकुलाः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
निशम्य च गुणोपेतं व्राह्मणं साधुसंमतम् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
निशम्य च यथान्याय़ं प्रय़च्छ कुरुसत्तम ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
निशम्य तं प्रत्यनदंस्तु कौरवा; स्ततो ध्वनिर्भुवनमथास्पृशद्भृशम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
निशम्य तत्पार्थवचोऽव्रवीदिदं; धनञ्जय़ं धर्मभृतां वरिष्ठः |
९१ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य तद्वचनं पार्थिवस्य; दुर्योधनो रहिते सौवलश्च |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य तद्वचो मातुर्व्यासः परमवुद्धिमान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य तां पार्थिव पार्थभाषितां; गिरं नरेन्द्राः प्रशशंसुरेव ते |
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
निशम्य दमय़न्त्यास्तत्करुणं परिदेवितम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः ||
५१ ख