शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
तस्मात्क्षमेत वालाय़ जडाय़ वधिराय़ च |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्क्षिप्रं मद्रपते प्रय़ाहि; रणे पाञ्चालान्पाण्डवान्सृञ्जय़ांश्च |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्क्षिप्रं विनिर्यामो योजय़ित्वा वरूथिनीम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्क्षिप्रं वुभुत्सध्वं यथा नोऽत्यन्तमव्ययम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
तस्मात्तं नैपुणेनाद्य ममाख्यातुं त्वमर्हसि ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्तं परिपप्रच्छ नान्यं कञ्चिद्विशेषतः |
९६ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
तस्मात्तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
तस्मात्तडागं कुर्वीत आरामांश्चैव रोपय़ेत् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
तस्मात्तडागे वृक्षा वै रोप्याः श्रेय़ोर्थिना सदा |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्तत्र निवासं तु छन्नं सत्रेण धीमतः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
तस्मात्तदध्यवसतस्तपस्वि तप उच्यते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
तस्मात्तदविघाताय़ कर्म कुर्यादकल्मषम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
तस्मात्तदा योजय़ेत परेषां व्यसनेषु वा |
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्तदृषय़ो नित्यं प्राहुर्विनशनेति ह ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
तस्मात्तद्वै भवद्वुद्ध्या श्रोतुमिच्छामि व्राह्मण |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
तस्मात्तन्मात्रमादद्याद्यावदत्र प्रय़ोजनम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
तस्मात्तपः समास्थाय़ कुरुष्वात्ममनोरथम् ||
७९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
तस्मात्तपो व्यवस्यन्ति तद्भवं व्रह्मवादिनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
तस्मात्तर्षात्मकाद्रागाद्वीजाज्जाय़न्ति जन्तवः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
तस्मात्तव भय़ं नास्ति व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्तव सुतो राजन्प्रहृष्टो वाक्यमव्रवीत् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
तस्मात्तवैको भ्रातॄणां यमिच्छसि स जीवतु ||
६५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तस्मात्तस्मै महादण्डो धार्यः स्यादिति मे मतिः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
तस्मात्तस्य मनो नित्यं व्रह्मचर्येऽभवन्नृप ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
तस्मात्तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
तस्मात्तस्यैव सेनाग्रं भित्त्वा यास्यामि सैन्धवम् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
तस्मात्तांस्ते प्रवक्ष्यामि तडागे ये गुणाः स्मृताः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
तस्मात्तात व्रवीमि त्वां वक्ष्यामि च पुनः पुनः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
तस्मात्तापत्य यत्किञ्चिन्नृणां श्रेय़ इहेप्सितम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तस्मात्तिष्ठेत्सदा पूर्वां पश्चिमां चैव वाग्यतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
तस्मात्तीक्ष्णः प्रजा राजा स्वधर्मे स्थापय़ेदुत |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
तस्मात्तु परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्ते नैव कौन्तेय़ पीडनीय़ो नराधिपः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्ते भवितापत्यमनुरूपमसंशय़म् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
तस्मात्ते भ्रातरः सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्ते यत्प्रिय़ं किञ्चित्तत्सर्वं करवाण्यहम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
तस्मात्ते वचनं देवि करिष्यामि न संशय़ः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
तस्मात्ते वर्तय़िष्यामि तय़ोरेव समाह्वय़म् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
तस्मात्ते वर्तय़िष्यामि दुर्गकर्म विशेषतः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
तस्मात्ते वै नमस्यन्ति श्वसनं द्रुमसत्तमाः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
स्त्र्यु उवाच
तस्मात्ते शक्र जीवन्तु ये जाताः स्त्रीकृतस्य वै ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात्ते संशय़ः कृष्णे नीहार इव नश्यतु |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
तस्मात्ते सुभगे नास्ति परलोककृतं भय़म् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
भीमसेन उवाच
तस्मात्ते सूतपुत्रेभ्यो न भय़ं भीरु विद्यते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात्तेजसि कर्तव्ये क्रोधो दूरात्प्रतिष्ठितः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
तस्मात्तेनैव भावेन सानुषङ्गेन पार्थिवाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्तेषु न कर्तव्या कृपा ते मधुसूदन ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्तेषु महादण्डः क्षेप्तव्यः क्षिप्रमच्युत |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
तस्मात्तेषु विशेषेण मृदुपूर्वं समाचरेत् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
तस्मात्तेऽद्य प्रदास्यामि स्वमांसं तुलय़ा धृतम् ||
२४ ख