chevron_left  द्विषच्छरीरापहरंarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
द्विषच्छरीरापहरं सुघोर; माधुन्वतः सर्पमिवोग्ररूपम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
द्विषच्छिरोभिः पृथिवीमवतस्तार फाल्गुणिः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
द्विषतां च प्रहर्षोऽभूदार्तिश्चाद्विषतामपि |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
द्विषतां नोऽस्तु भीष्मैष प्रभावः केशवस्य यः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
द्विषतां भिन्ध्यनीकानि गजानामिव यूथपः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
द्विषतां भय़कर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् |
९० क
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
द्विषद्भिस्त्वं सम्प्रय़ोगाभिनन्दी; मुहुर्द्वेषं यासि नः सम्प्रमोहात् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
द्विषन्तं कृतकर्माणं गृहीत्वा नृपती रणे |
६ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
द्विषन्ति सर्वभूतानि ताडय़न्ति च राक्षसाः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
द्विषन्मध्यमवस्कन्द्य राधेय़ो धनुरुत्तमम् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
संवर्त उवाच
द्विषेतां समभिक्रुद्धावेतदेकं समर्थय़ ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
द्विसन्ध्यं पठितः पुत्र कल्मषापहरः परः ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
द्विसप्तत्या महावाहो ततः षाड्गुण्यचारिणः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
द्विसहस्रं द्वापरे तु शते तिष्ठति सम्प्रति ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
द्विसाहस्रा विदिता युद्धशौण्डा; नानादेश्याः सुभृताः सत्यसन्धाः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
द्विसाहस्रान्समरे सव्यसाची; कुरुप्रवीरानृषभः कुरूणाम् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
द्विसाहस्राश्च मातङ्गा गिरिरूपाः प्रहारिणः |
९ क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विस्तावत्पुरुषादानां रक्षसां भीमकर्मणाम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
द्विस्तीर्थानि मय़ा पूर्वं दृष्टानि कुरुनन्दन |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
द्विस्त्रिरात्रमथैवात्र निर्दिष्टं पुरुषर्षभ ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
च्यवन उवाच
द्विय़ोजनशतास्तस्य दंष्ट्राः परमदारुणाः |
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विय़ोजनाय़ता वापी विस्तृता चापि योजनम् |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
द्विय़ोनिं त्रिविधोपाय़ं वहुकल्पं युधिष्ठिर ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपं ताम्राह्वय़ं चैव पर्वतं रामकं तथा |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपतन्तं श्रमान्वितम् |
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
द्वीपश्च योजनोत्सेधः सिद्धचारणसेवितः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
द्वीपानेतान्महाराज रक्षंस्तिष्ठति नित्यदा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपाश्च सान्तरद्वीपा नानाजनपदालय़ाः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
द्वीपिचर्मावनद्धश्च नागदन्तकृतत्सरुः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
द्वीपिचर्मावनद्धैश्च व्याघ्रचर्मशय़ैरपि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
द्वीपिनं लेलिहद्वक्त्रो व्याघ्रो रुधिरलालसः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
द्वीपिनः खड्गभल्लूका ये चान्ये भीमदर्शनाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपिनश्च महाभाग सर्वानेव न संशय़ः ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
द्वीपी जीवितरक्षार्थमृषिं शरणमेय़िवान् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपे न्यस्तः स यद्वालस्तस्माद्द्वैपाय़नोऽभवत् ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां कुरुनन्दन ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपेऽस्या एव सरितः कन्यैव त्वं भविष्यसि ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
द्वीपो य आसीत्पाण्डूनामगाधे गाधमिच्छताम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपोऽभवद्यत्र वृकोदरस्य; युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
द्वीपोऽभूस्त्वं हि पार्थानां नगरे वारणावते |
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
द्वे कर्मणी नरः कुर्वन्नस्मिँल्लोके विरोचते |
५० क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
द्वे च नागशते मुख्ये प्रादाद्वहु धनं तदा ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
द्वे चान्ये भरतश्रेष्ठ प्रवृत्तिमनुवर्तता ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
द्वे चापि भार्ये वैश्यस्य द्वय़ोरात्मास्य जाय़ते |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा व्राह्मणा विदुः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय २९८
यक्ष उवाच
द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्पराय़िके ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
द्वे मे शते संनिहिते हय़ानां यद्विधास्तव |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा ||
१०६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
द्वे व्रह्मणी वेदितव्ये शव्दव्रह्म परं च यत् |
१ ख