उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
तस्मात्संश्रावय़ामि त्वां विजय़ं जय़तां वर |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
तस्मात्संशय़ितेऽप्यर्थे कार्य एव पराक्रमः |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्संस्तम्भय़ात्मानं श्रुतवानसि पाण्डव |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
तस्मात्संहर दिव्यं त्वमस्त्रमेतन्महाभुज ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
तस्मात्संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्संय़च्छ कोपं त्वं स्वमनुस्मृत्य दुष्कृतम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
यातुधान्यु उवाच
तस्मात्सकृदिदानीं त्वं व्रूहि यन्नाम ते द्विज ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
तस्मात्सक्तून्ग्रहीष्यामि वधूर्नार्हसि वञ्चनाम् |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
७४
देवय़ान्यु उवाच
तस्मात्सङ्कीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
तस्मात्सङ्घातमेवाहुर्गणानां शरणं महत् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
तस्मात्सङ्घातय़ोगेषु प्रय़तेरन्गणाः सदा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
तस्मात्सञ्जनय़ेत्कोशं संहृत्य परिपालय़ेत् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
तस्मात्सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमञ्जसा ||
६८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
तस्मात्सत्यं व्रुवन्साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीय़ते ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
तस्मात्सत्यव्रताचारः सत्ययोगपराय़णः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
तस्मात्सत्याश्रय़ा विप्रा नित्यं योगपराय़णाः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सत्रं प्रविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
तस्मात्सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
तस्मात्सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणय़मिच्छति ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
तस्मात्सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चाम नेतरान् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
तस्मात्सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित्किञ्चिदग्रतः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
तस्मात्सनत्कुमारत्वं यो लभेत स्वकर्मणा ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
तस्मात्सन्तोषमेवेह धनं पश्यन्ति पण्डिताः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सन्तोषमेवेह धनं पश्यन्ति पण्डिताः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सप्तसु सेनासु प्रणेतॄन्मम पश्यत ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
तस्मात्समाहितं वुद्ध्या मनो भूतेषु धारय़ेत् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
तस्मात्समीक्षय़ैव स्याद्भवेत्तस्मिंस्ततो गुणः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्सम्पश्यतस्तस्य द्रावय़िष्यामि वाहिनीम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
तस्मात्सम्यक्परीक्षेत दोषानज्ञानसम्भवान् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सर्वं यज्ञ एवोपय़ोज्यं; धनं ततोऽनन्तर एव कामः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
तस्मात्सर्वगतं व्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वप्रय़त्नेन परीक्ष्यामन्त्रय़ेद्द्विजान् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वप्रय़त्नेन पुरुषः पूजय़ेत्सदा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वसमारम्भो दुर्लभः पुरुषव्रजः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
तस्मात्सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलय़विक्रिय़ाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वाणि कार्याणि चपलो हन्त्यसंशय़म् ||
१४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारय़ेत् ||
१०५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारय़ेत् ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्ररोधय़ेत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वाणि भूतानि धर्ममेव समासते ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्सर्वानुपासङ्गान्सर्वोपकरणानि च |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सर्वान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तस्मात्सर्वान्ददाम्यद्य कामांस्तव यथेप्शितान् ||
१७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वासु सेनासु योजय़न्ति जय़ार्थिनः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जय़ेत् |
८४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः |
१८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१००
भीष्म उवाच
तस्मात्सर्वास्ववस्थासु शूरः संमानमर्हति ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्सर्वे उदीक्षध्वं क्व नु स्युः पाण्डवा गताः ||
२ ख