chevron_left  तस्मादनर्हमश्लीलमप्रिय़ंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
तस्मादनर्हमश्लीलमप्रिय़ं द्रौणिमुक्तवान् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
तस्मादनवरोधश्च विद्यते तत्र लक्षणम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
तस्मादनार्जवे वुद्धिर्न कार्या ते कथञ्चन ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
तस्मादनार्जवे वुद्धिर्न कार्या ते कथञ्चन ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
तस्मादनिष्टनाशार्थमितिहासं निवोध मे |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
तस्मादनुज्ञां सम्प्राप्य जगाम पितरं प्रति ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
तस्मादन्धो जास्यसि त्वं मच्छापान्नात्र संशय़ः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
तस्मादन्नं परं लोके सर्वदानेषु कथ्यते ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्याय़परिवर्जितम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं मानवैर्भुवि ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छन्ति मानवाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
तस्मादन्यत्र यास्यामि वस्तुं नाहमिहोत्सहे |
८८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
तस्मादपक्रमाम्येष भय़ादस्मात्सुदारुणात् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २२३
द्रौपद्यु उवाच
तस्मादपत्यं विविधाश्च भोगाः; शय़्यासनान्यद्भुतदर्शनानि |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
देवा ऊचुः
तस्मादपत्यसन्ताने यतस्व द्विजसत्तम ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मादपरिहार्येऽर्थे सम्प्राप्ते कृच्छ्र उत्तमे |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
तस्मादपि विनिर्मुक्ता अनिरुद्धतनौ स्थिताः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादपि स कौरव्य गान्धारविषय़ं हय़ः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिष्टुतम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ९१
वसव ऊचुः
तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादप्रतिरूपाभिर्वाग्भिर्मां त्वं समर्छसि ||
३ ग
आदि पर्व
अध्याय १७१
पितर ऊचुः
तस्मादप्सु विमुञ्चेमं क्रोधाग्निं द्विजसत्तम ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
श्वपच उवाच
तस्मादभक्ष्ये भक्षणाद्वा द्विजेन्द्र; दोषं न पश्यामि यथेदमात्थ ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तस्मादभीतवद्भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् |
१९७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तस्मादभीतवद्भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् |
२०३ क
आदि पर्व
अध्याय १४४
व्यास उवाच
तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम साम्प्रतम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
तस्मादभ्युपगन्तव्यं युद्धाय़ भरतर्षभ ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय ७९
यय़ातिरु उवाच
तस्मादराज्यभाक्तात प्रजा ते वै भविष्यति ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
कृष्ण उवाच
तस्मादरिं न मृष्यन्ति वालमर्थपराय़णम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय १५५
भीष्म उवाच
तस्मादर्थे च धर्मे च तपो नानशनात्परम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तस्मादर्हसि गाङ्गेय़ कृपां कर्तुं मय़ि प्रभो |
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
तस्मादलिङ्गः क्षेत्रज्ञः केवलं ज्ञानलक्षणः ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञो धर्मव्रतमनुव्रतः |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
तस्मादवरजं लोके यदिदं क्षत्रसञ्ज्ञितम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादवरजो यस्तु राजन्नश्वपतिः स्मृतः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
तस्मादवाक्षिरा राजन्प्राप्तोऽस्मि नरकं विभो ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम ||
२९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
तस्मादशेषतो व्रूहि स्त्रीधर्मं विस्तरेण मे ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादसि मय़ा पुत्र युद्धार्थं परिचोदितः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु माय़या ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्रः पाहि वै शिशुम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
तस्मादस्मिन्हते शत्रौ हताः सर्वेऽहितास्तव |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
शुनःसख उवाच
तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निवोधत ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मादस्याभिमानस्य सद्यः फलमवाप्नुहि ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
तस्मादस्यावलेपस्य सद्यः फलमवाप्नुहि |
१४ क